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हरिश्चंद्र त्रिपाठी ‘हरीश ‘ के द्वारा रचित पैसों की बचत पर बेहतरीन दोहे

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पढ़ लिख कर हम योग्य बन, करें कमाई नेक,

अपनों से ऊपर उठ सोचें,परहित धर्म अनेक। 1।
जितनी होती दक्षता, उतना मिलता लाभ, 
नहीं मिले अतिरिक्त कुछ, मीत सुनो तुम साफ। 2।
अपनी आय विचार के, खर्च करो श्रीमान, 
रहो सुखी परिवार संग, रहे बचत का ध्यान। 3।
बूॅद- बूॅद से घट भरे, अक्षर- अक्षर ज्ञान, 
थोड़ा- थोड़ा बचत कर, तुम भी बनो महान। 4।
आज बचत जो कर लिया, कल आयेगा काम, 
कौन जानता वक्त को, करे सुबह को शाम। 5।
सोच-समझ, व्यवहार में, नहीं अपव्यय होय, 
पैसों के ही बचत से, सुख-दुःख अनुभव होय। 6।
पैसों की ही बचत से, तन-मन स्वस्थ प्रसन्न, 
अपने संग ही देश का, रहे कोष सम्पन्न। 7।
रचयिता:-
हरिश्चंद्र त्रिपाठी ‘हरीश ‘
ई-8,मलिक मऊ नई कालोनी, 
रायबरेली (उ0प्र0)229010