अविनाश तिवारी के दोहे

doha sangrah

अविनाश तिवारी के दोहे


घड़ी

घड़ी घड़ी का फेर है,
    मन में राखो धीर।
राजा रंक बन जात है,
   बदल जात तकदीर।।

प्रेम

प्रेम न सौदा मानिये,
    आतम  सुने पुकार।
हरि मिलत हैं प्रीत भजे
मति समझो व्यापार।।

दान

देवन तो करतार है,
  मत कर रे अभिमान।
दान करत ही धन बढ़ी,
   व्यरथ पदारथ जान।।

व्यवहार

कटुता कभू न राखिये,
   मीठा राखो व्यवहार
इक दिन सबे जाना है,
    भवसागर के पार।।

अविनाश तिवारी


इस रचना को शेयर करें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top