महँगाई पर दोहे

महँगाई पर दोहे

महँगाई की मार से , हर जन है बेहाल।
निर्धनभूखा सो रहा,मिले न रोटी दाल।।1।।


महँगाई डसती सदा,निर्धन को दिनरात।
पैसा जिसके पास है,होती उसकी बात।।2।।


महँगाई में हो गया , गीला आटा दाल।
पूँछे कौन गरीब को,जिसका है बेहाल।।3।।


सुरसा के मुख सी बढ़े,महँगाई की मार।
देखो तो चारों तरफ , होता हाहाकार।।4।।


महँगी हर इक चीज है,बढ़े हुए है भाव।
डर जाते सब देखके, महँगाई के ताव।।5।।


आटा चावल दाल सब,हुए सभी हैं दूर।
महँगाई के दौर में,खुशियां चकनाचूर।।6।।


सभी ओर होने लगी, महँगाई की बात।
ओर विषय भूले सभी,लगे रहो दिनरात।।7।।


महँगाई के राज में , स्वप्न गए सब भूल।
भर जाए बस पेट ही,बाकी सभी फिजूल।।8।।


निर्धन निर्धन हो रहा ,धनी बना धनवान।
महँगाई के दौर में, टूट गए अरमान।।9।।


प्याज टमाटर छू रहे , आसमान से भाव।
चूल्हा अब कैसे जले , महँगाई के दाँव।।10।।

©डॉ एन के सेठी
बाँदीकुई(दौसा)राज

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