नास्तिक पर कविता

नास्तिक पर कविता

नास्तिक ही
पैदा हुआ था मैं
बाकी भी
होते हैं पैदा नास्तिक ही
मानव मूल रूप में
होता है नास्तिक

नाना प्रकार के
प्रपंच करके उसे
बनाया जाता है आस्तिक
कितना आसान है आस्तिक होना
बिना जाने मानना है
बिना तर्क किए मानना है
किसी को नकारने के लिए
चिंतन-मनन, तर्क-वितर्क
अनुसंधान करना पड़ता है

भले कितना ही दिखावा करें
आस्तिक होने का
धर्म स्थलों के प्रभारी
होते हैं अधिक नास्तिक
गवाह हैं
दानपात्रों पर लगे ताले
धर्मस्थलों में लगे
सी. सी./टी. वी. कैमरे

पंडित-मुल्ला-पादरी
नहीं करते विश्वास
ईश्वर-अल्लाह-गॉड पर

विनोद सिल्ला©

बहार
बहार
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0 thoughts on “नास्तिक पर कविता”

  1. मनीभाई नवरत्न

    एकदम तीखा और सीधा प्रहार

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