इस कविता में: ‘मन का अबीर’ शीर्षक के अंतर्गत आधुनिक समाज के खोखलेपन और दिखावे पर कटाक्ष करती यह हिंदी कविता मानवीय संवेदनाओं के असली रंगों की तलाश करती है।
भूमिका
होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि अंतर्मन के उन धूसर कोनों को रंगने का अवसर है, जहाँ नैतिकता और संवेदनाएं जमी हुई हैं। आज के दिखावटी डिजिटल युग में, जब हम स्क्रीन के माध्यम से बधाइयां भेजते हैं, तब ‘मन का अबीर’ कहीं खो सा गया है। यह कविता इसी खोए हुए अस्तित्व की पुकार और व्यवस्था पर एक प्रहार है।

मन का अबीर (अतुकांत कविता)
मन का अबीर (अतुकांत कविता)
बाहर से सजे हुए चेहरों पर
कृत्रिम रंगों की परतें इतनी गाढ़ी हैं
कि पहचानना मुश्किल है
कौन सा रंग बाजार का है
और कौन सा रंग भीतर की सड़न का।
बाजार में अबीर की थैलियों में
केवल रंग नहीं बिकते
बिकती है हमारी खोखली अस्मिता
बिकती है वह प्रतिस्पर्धा
जो हमें एक-दूसरे से और दूर ले जाती है।
देखो!
वह खड़ा है चौराहे पर
सफेद कुर्ते में लिपटी हुई अपनी बेदाग नैतिकता लिए
पर जिसके हाथों में लगे हैं
दूसरों के पसीने और खून के दाग
क्या वह भी उड़ाएगा ‘मन का अबीर’?
अजीब विडंबना है!
हम सोशल मीडिया की चमकती दीवार पर
होली की शुभकामनाएं चिपका रहे हैं
और ठीक बगल में,
एक भूखा बच्चा कचरे के ढेर में
अपने हिस्से की होली तलाश रहा है।
व्यंग्य यह है कि
हमने देवताओं को भी रंगों में बांट दिया है
पूजा की थाली में अब श्रद्धा कम
दिखावे की सामग्री अधिक है
मंदिर के द्वार पर लगे सीसीटीवी कैमरों में
ईश्वर को नहीं, हम अपनी लोकप्रियता को ढूंढ रहे हैं।
सुनो!
यह उत्सव नहीं, विद्रूप है
जब तक मन का अबीर उड़कर
किसी के आंसू न पोंछे
जब तक यह गुलाल
किसी के घाव पर मरहम न बने
तब तक सब व्यर्थ है।
आज के इस शोर में
जहाँ भीड़ तंत्र का बोलबाला है
सच्चाई को ‘आउटडेटेड’ करार दिया जाता है
यहाँ ओज की आवश्यकता है—
ऐसे ओज की, जो भीड़ से अलग खड़ा हो
जो सवाल पूछे कि क्या हम वास्तव में
भीतर से रंगीन हैं?
मिटा दो यह बनावटीपन
छोड़ो यह डिजिटल मुखौटा
अपने अंतर्मन की गहराइयों में झांको
वहाँ कोई रंग नहीं है
सिवाय उस प्रेम के,
जो निस्वार्थ है, जो ओजपूर्ण है।
उड़ाओ मन का अबीर
मगर इस बार हवा के रुख के साथ नहीं
मगर इस बार व्यवस्था के विरुद्ध
अपने विवेक की मशाल लेकर।
क्योंकि अंत में,
दिखावे के रंगों को तो बारिश धो देगी
बच जाएगा वही, जो तुम्हारे भीतर
ईमानदारी का रंग बनकर धड़केगा।
भावार्थ
यह कविता आधुनिक समाज में व्याप्त दोहरेपन पर कड़ा प्रहार करती है। कवि का मानना है कि आज की ‘होली’ केवल दिखावा बनकर रह गई है। जहाँ एक ओर लोग भौतिक रंगों के पीछे भाग रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक संवेदनाएं मर रही हैं। ‘मन का अबीर’ का अर्थ केवल गुलाल नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि और निस्वार्थ प्रेम है। कविता में कवि ने व्यंग्य के माध्यम से यह संदेश दिया है कि जब तक हम बाहरी आडंबर त्यागकर वास्तव में मानवीय दुखों को साझा नहीं करेंगे, तब तक हमारा उत्सव अधूरा है।
पाठकों से आग्रह
यह कविता आपको कैसी लगी? क्या आपने भी आज के दिखावटी समाज में अपनों को दूर होते महसूस किया है? अपने विचार नीचे टिप्पणी में साझा करें। यदि आपको यह रचना मर्मस्पर्शी लगी, तो इसे अपने मित्रों के साथ साझा करें और ऐसी ही साहित्यिक चर्चाओं से जुड़ने के लिए हमारे ब्लॉग को फॉलो करें।




