⚖️ न्याय की आवाज़
(विश्व सामाजिक न्याय दिवस पर अतुकान्त कविता)
यह आवाज़
अदालत की दीवारों से नहीं,
भूखे पेट,
नंगे पाँव
और दबे हुए सपनों से निकलती है।
यह आवाज़
किसी जाति, रंग या भाषा की नहीं,
यह उस हाथ की है
जो हमेशा
कतार के आख़िर में खड़ा रहता है।
न्याय तब नहीं होता
जब केवल कानून लिखे जाएँ,
न्याय तब होता है
जब डर के बिना
सच बोलने की जगह मिले।
यह आवाज़
भीख नहीं माँगती,
यह अपना हक़ पूछती है—
सम्मान का,
अवसर का,
और बराबरी का।
सुनो!
अगर यह आवाज़
आज भी अनसुनी रही,
तो कल
ख़ामोशी ही
सबसे बड़ा अन्याय होगी।
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