एक कविता हूँ

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“एक कविता हूँ!”
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उंगलियों में कलम थामे
सोचता हूँ…
कि कहीं
है वह ध्वनि
जो उसे ध्वनित करे…!
मैं अंतरिक्ष में तैरता..
कल्पनाओं में
छांटता हूँ
शब्द
मीठे -मीठे
कोई शब्द मिलता नहीं मुझे
जो इंगित करे उसे
बस….
उंगलियों से ही उसे –
उकेरता हूँ …
मिटाता हूँ ।
उंगलियों में कलम थामे…
मैं सोचता हूँ ।।
उसकी खूबसूरती
वो भोलापन
तो मुझपे क़यामत ढाई
न कोई उपमा सूझी
न अतिशयोक्ति ही काम आई
जब भी लिखना चाहूँ
उसपे कोई कविता –
न कोई शब्द सूझता है…
न भाता है
और मैं…
बस लकीरें ही खींचते जाता हूँ ।
उंगलियों में कलम थामे…
मैं सोचता हूँ ।।
उन आड़ी-तिरछी लकीरों में भी
वो ही तो मुझको दिखती है…
जो आहिस्ता से कानों में मेरे कहती है–
‘इन पन्नों पर खींची है तुमने
जो आड़ी-तिरछी रेखाएँ …
वो मैं ही तो हूँ ‘
“एक कविता हूँ “!!!
-@निमाई प्रधान’क्षितिज’
      03/09/2016

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