यार तेरी कसम

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गज़ल : सादर समीक्षार्थ –
212 212 212 212
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रूठ जाऊँ कभी तो मनाना मुझे।
कर ये वादा कभी मत सताना मुझे।।

गर कहीं भूल जाऊँ ये राहे वफ़ा,
*यार तेरी कसम* मत भुलाना मुझे।

जिंदगी की डगर में बड़ी मुश्किलें,
थाम दामन मेरा तू चलाना मुझे।

आदमी तो है जिन्दा ख़ुशी के लिए,
गम अगर आ भी जाये हँसाना मुझे।

इस कदर यार *बोधन* सताना नहीं,
दिल चुराना कभी आजमाना मुझे।
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गज़लकार:-
बोधन राम निषादराज”विनायक”
सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)
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