राष्ट्रवाद

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*राष्ट्रवाद*
*विधा     : गीतिका छंद*
*मापनी:  2122 2122 2122 212*
*बाँध पाया कौन अब तक सिंधु के उद्गार को।*
*अब न बैरी सह सकेगा सैन्य शक्ति प्रहार को।1*
*तोड़ डालें सर्व बंधन जब करे गुस्ताखियाँ।*
*झेल पायेगा पड़ोसी शूरता के ज्वार को।2*
*कांपता अंतःकरण से यद्यपि बघारे शेखियाँ।*
*छोड़ रण को भागने खोजा करे अब द्वार को।3*
*मानसिकता में कलुष है छल प्रपंचों में जुटा।*
*कूटनीतिक योग्यता से अवसर न दें अब वार को।4*
*देश ने है ली शपथ हम आक्रमण न करें कभी।*
*हम सजग सैनिक खड़े हैं राष्ट्र के विस्तार को।5*
*राष्ट्रवादी भावना हम में भरी है कूट कर।*
*जाति धर्म न बाँट पाये अब हृदय उद्गार को।6*
*सैनिकों से प्रेरणा ले देश अब फिर एक हो।*
*आज पनपायें पुनः सब राष्ट्रवाद विचार को।7*
*कर्नल प्रवीण त्रिपाठी*
*नई दिल्ली, 10 फरवरी 2019*
*मोबाइल 7340145333*

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