कोठी तो बढ़हर के छलकत ले भरगे
कोठी तो बढ़हर के छलकत ले भरगे कोठी तो बढ़हर के* छलकत ले भरगे।बइमानी के पेंड़ धरे पुरखा हा तरगे॥अंतस हा रोथे संशो मा रात दिन।गरीब के आँसू हा टप-टप ले* ढरगे॥सुख के सपुना अउ आस ओखर मन के।बिपत के आगी मा सब्बो* हा जरगे॥सुरता के रुखवा हा चढ़े अगास मा।वाह रे वा किस्मत! पाना … Read more