कलम के सिपाही -मुंशी प्रेमचंद जी

मेरे मूर्धन्य मुंशी प्रेमचंद जी
थे बड़े ” कलम के सिपाही “
अब…….”भूतो न भविष्यति”
हे ! मेरे जन जन के हमराही !
उपन्यास सम्राट व कथाकार
जनमानस के ये साहित्यकार,
गरीब-गुरबों की पीड़ा लिखते
थे अन्नदाता के तुम पैरोकार !
समस्याएँ,,,,संवेदनाओं का
करते थे मार्मिक शब्दांकन,
‘झंकृत और चमत्कृत’ रचना
होते भावविभोर चित्रांकन !
ये रूढ़िवादी परम्पराओं का
करते थे गज़ब..का विवेचन ,
कुरूतियों से निकालने का
करते चिंतन और उन्मोचन !
इनकी कालजयी रचनाओं से
गुंजित हो उठा साहित्य गगन,
जन्मदिन पर धनपतराय को
मेरा अनेकोनेक सादर नमन !
— *राजकुमार मसखरे*
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