खुद की तलाश _ तबरेज़ अहमद

खुद की तलाश _ तबरेज़ अहमद

kavita

**ख़ुद कि तलाश से बेहतर*
*मुझे कोई तलाश नहीं दिखती।*
दरिया के पास रहकर भी प्यासा रहता हूँ मैं।
कितने खुदगर्ज़ है ज़माने में लोग।
उन्हें मेरी प्यास नहीं दिखती।
महफ़िल में बुलाकर मुझे,वो मेरे साथ ग़ैरों जैसा बर्ताव करती है।
ना जाने क्यों उसे मेरे प्यार का अहसास नहीं दिखती।
मिल गया है उसे कोई नया रक़ीब।
इसलिए अब मेरे लिखे ग़ज़ल उसे ख़ास नहीं दिखती।
पहले मुझसे बाते ना हो तो तो ग़मज़दा दिखती थी वो।
जबसे किसी ग़ैर को हमसफ़र बनाया है उसने उदास नहीं दिखती।
मुझे आज भी उसके छोड़ने का बड़ा ग़म सताता है।
एक वो है तबरेज़ जो निराश नहीं दिखती।

*तबरेज़ अहमद*
*बदरपुर नई दिल्ली*

0 thoughts on “खुद की तलाश _ तबरेज़ अहमद”

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top