प्रेरणा का अंत, स्पष्टता की शुरुआत
जब प्रेरणा
बाहर से आती है,
तो
वह बाहर के साथ ही
खत्म हो जाती है।
कोई भी बाहरी चिंगारी
हमेशा
जल नहीं सकती।
हम अक्सर
किसी लक्ष्य के पीछे
इस भरोसे से दौड़ते हैं—
कि
जब यह मिल जाएगा,
तब
मैं पूरा हो जाऊँगा।
यह भावना
अजनबी नहीं है।
अभी मैं पर्याप्त नहीं हूँ,
पर
उस मुकाम पर पहुँचकर
मुझे
खुद को अच्छा महसूस करने का
अधिकार मिल जाएगा।
यही
अधूरापन
हमारी दौड़ का
ईंधन बन जाता है।
घाव जितना गहरा,
भागने की गति
उतनी तेज़।
कई लोगों के लिए
डर
सबसे आसान ईंधन है।
मालिक डाँटता है—
काम शुरू।
असुरक्षा सताती है—
मेहनत तेज़।
पर क्या
चलने का यही
एक तरीका है?
क्या
हमें हमेशा
डर से धकेला जाना
या
लालच से खींचा जाना
ज़रूरी है?
प्रेरणा मत माँगो।
धमकी का इंतज़ार मत करो।
यह
किराए के सैनिक की
मानसिकता है—
पैसे दो, तो काम करूँगा।
या
मजबूर करो, तो झुक जाऊँगा।
क्या
यही जीवन है?
गाजर और छड़ी का
अंतहीन खेल?
अपना
असली इंजन खोजो।
ऐसा बल
जो
डर से गहरा हो,
लालच से बड़ा हो।
जब वह मिलता है,
तो
प्रयास
गायब हो जाता है।
काम
खेल बन जाता है।
चलना
स्वाभाविक हो जाता है।
दिन
खींचता नहीं—
तुम
दिन बन जाते हो।
जहाँ
डर या लालच
राज करता है,
वहाँ
आनंद के लिए
जगह कहाँ?
दिन के अंत में
कितने चेहरे
वास्तव में
दमकते हैं?
सच्चा कर्म
प्रेरणा से नहीं
उठता।
वह
स्पष्टता से
खिलता है।
जब यह साफ़ हो जाए
कि
क्या सही है,
तो
करना
स्वतः हो जाता है।
तब
काम बोझ नहीं रहता।
वह
उत्सव बन जाता है।
अभिव्यक्ति बन जाता है।
जीवन का
सीधा प्रवाह।
तब
सुबह
डर के साथ नहीं,
शांत उत्सुकता के साथ
खुलती है।
तुम
अपने काम की ओर
ऐसे बढ़ते हो
जैसे
साँस की ओर,
जैसे
धड़कन की ओर।
और तब
काम
कर्म नहीं रहता—
वह
तुम्हारी
जीवित सच्चाई
बन जाता है।
न बोझ।
न सौदा।
सिर्फ़
स्पष्टता में
बहता हुआ
जीवन।
Manibhai Navratna
