KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

रात ढलती रही

*रात ढलती रही*

रात ढलती रही, दिन निकलते रहे,
उजली किरणों का अब भी इंतजार है।
दर्द पलता रहा, दिल के कोने में कहीं ,
लब पर ख़ामोशियों का इजहार है।
जीवन का अर्थ इतना सरल तो नहीं,
कि सूत्र से सवाल हल हो गया।
एक कदम ही चले थे चुपके से हम,
सारे शहर में कोलाहल हो गया।
संवादों का अंतहीन सिलसिला,
शब्द -बाणों की भरमार है।
दर्द—–
जिंदगी का भरोसा हम कैसे करें,
वक्त इतना मोहलत तो देता नहीं।
चाँदनी की छटा बिखरे मावस पे कभी,
रात में सूरज तोनिकलता नहीं ।
रौशन- सितारों पर पहरा हुआ,
नजर आता तो बस अंधकार है।
दर्द ——–
दुनियां के मुखौटों  की बातें छोड़ो,
हर रिश्ता है पैबन्द लगा हुआ।
शब्द -जाल हो गये हैं, जीने के ढंग,
जिंदगी अर्थ कोहरा- कोहरा हुआ ।
खुशियाँ दुल्हन सी शर्माती रही,
दर्द जिंदगी का दावेदार है ।
दर्द—–
सुधा शर्मा
राजिम छत्तीसगढ़

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