वन

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वन
अब ना वो वन है
ना वन की स्निग्ध छाया
जहाँ बैठकर विक्रांत मन
शांत हो जाता था
जहाँ वन्य जीव करती थी अटखेलियाँ
जहाँ हिरनों का झुण्ड भरती थी चौकड़ियाँ
वन के नाम पर बचा है
मिलों दूर खड़ा अकेला पेड़
कुछ पेड़ों के कटे अवशेष
या झाड़ियों का झुरमुट
जो अपनी दशा पर है उदास
बड़ी चिंतनीय बात है
वनों की उजड़ती बिसात है
वन को काट
चढ़ रहे हैं
विकास की सीढ़ी
बड़ी बड़ी ईमारतों पर
वन की तस्वीर टंगा ही
देख पाएगी भावी पीढ़ी
साल ,सागौन ,खैर हो गए हैं दुर्लभ
शुद्ध प्राण वायु भी नहीं है सुलभ
✍ सुकमोती चौहान रुचि
ग्रा/पो -बिछिया(सा),तह -बसना जि – महासमुन्द ,छ.ग.

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