यहाँ पर हिन्दी कवि/ कवयित्री आदर० सुकमोती चौहान ‘रूचि’ के हिंदी कविताओं का संकलन किया गया है . आप कविता बहार शब्दों का श्रृंगार हिंदी कविताओं का संग्रह में लेखक के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा किये हैं .

पितृपक्ष पर कविता – सुकमोती चौहान रुचि

पितृपक्ष पर कविता - सुकमोती चौहान रुचि आया जब पितृपक्ष, बनाते हलवा पूरी |बड़ा फरा के भोग, बिजौरी भूरी -भूरी ||उत्सव का माहौल, दशम दिन तक रहता है |पितर पक्ष…

0 Comments

संवाद पर कविता – सुकमोती चौहान रुचि

संवादतुमसे कर संवाद, सुकूं मन को मिलता है |मधुर लगे हर भाष्य, सुमन मन में खिलता है |कर्णप्रिय हर बात, प्रेरणा देती हरदम | करके जिसको याद, दूर हो जाती…

0 Comments

गौरी पुत्र गणेश – सुकमोती चौहान

गौरी पुत्र गणेशआओ हे गौरी पुत्र गणेश!हरने हम सब के क्लेश।अग्र पूजन के अधिकारी,ज्ञान विद्या के भंडारी,मंगल मूर्ति अतुल बलधारी,पधारो हे गजानन!भरने जीवन में आनंद।आओ हे गौरी पुत्र गणेश!हरने हम…

0 Comments
sagar nadi
sagar

सागर पर हिंदी कविता – सुकमोती चौहान रुचि

सागर पर हिंदी कविता sagar सागर गहरा ज्ञान सा, बड़ा वृहद आकार |कौन भला नापे इसे, डूबा ले संसार |डूबा ले संसार, नहीं सीमा है कोई |कहलाये रत्नेश, यही कंचन…

0 Comments

सर्द हवाएँ – सुकमोती चौहान रुचि

सर्द हवाएँ - सुकमोती चौहान रुचि सर्द हवाएँ हृदय समाये, तन मन महका जाये |आ कानों में कुछ कहती है, मधुरिम भाव जगाये |हमको तुम कल शाम मिले थे, पसरी…

0 Comments

गुरुवर – सुकमोती चौहान रुचि

गुरुवर गुरु है आदरणीय , दूर करता अंधेरा ।पाकर ज्ञान प्रकाश , सफल है जीवन मेरा ।।सद् गुरु खेवनहार , कीजिए सदैव आदर ।कच्ची मिट्टी खण्ड , बनाया जिसने गागर…

0 Comments
वर्षा ऋतु विशेष कविता
वर्षा ऋतु विशेष कविता

प्रथम फुहार पर कविता – सुकमोती चौहान रुचि

प्रथम फुहार पर कविता वर्षा ऋतु विशेष कविता आया शुभ आषाढ़, बदलने लगे नजारे |भीषण गर्मी बाद, लगे घिरने घन प्यारे ||देखे प्रथम फुहार, रसिक अपना मन हारे |सौंधी सरस…

0 Comments

अहिल्या (खण्डकाव्य)- सुकमोती चौहान रुचि

इंद्र के गलती की वजह ऋषि गौतम ने माता अहिल्या शाप देकर पत्थर बना दिया। कालांतर में प्रभु श्रीराम के चरणस्पर्श द्वारा वे पुन: स्त्री बनी।

0 Comments
forest
forest

वन दुर्दशा पर हिंदी कविता

वन दुर्दशा पर हिंदी कविता वन दुर्दशा पर हिंदी कविता अब ना वो वन हैना वन की स्निग्ध छायाजहाँ बैठकर विक्रांत मनशांत हो जाता थाजहाँ वन्य जीव करती थी अटखेलियाँजहाँ…

0 Comments