रोटी पर कविताBy कविता बहार / हिंदी कविता रोटी पर कविता सांसरिक सत्य तोयह है किरोटी होती हैअनाज कीलेकिन भारत में रोटीनहीं होती अनाज कीयहाँ होती हैअगड़ों की रोटीपिछड़ों की रोटीअछूतों की रोटीफलां की रोटीफलां की रोटीऔर हांयहाँ परनहीं खाई जातीएक-दूसरे की रोटी-विनोद सिल्ला📢 इस पोस्ट को अपने दोस्तों के साथ शेयर करें: 📲 WhatsApp ✈ Telegram 📘 Facebook Related Posts ये शहर हादसों का शहर हो न जाए चुनाव का बोलबाला लोकतंत्र की हत्या नहीँ बताई अनुच्छेद 47 कवि होना नहीं है साधारण 0 thoughts on “रोटी पर कविता”Rampaul Indora January 28, 2020 at 8:19 amSahi baat sir, smaaj ki sachaiSARDANAND RAJLI January 28, 2020 at 8:59 amबहुत बढ़िया सरविनोद सिल्ला January 28, 2020 at 7:03 pmधन्यवाद रामपाल इंदौरा व सरदानंद जीLeave a CommentYour email address will not be published. Required fields are marked *Type here.. Name* Email* Website Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment.
Sahi baat sir, smaaj ki sachai
बहुत बढ़िया सर
धन्यवाद रामपाल इंदौरा व सरदानंद जी