कवि बन जाता है… – अभिषेक श्रीवास्तव “शिवाजी”

कवि बन जाता है…

कविता को भान कर, सच झूठ जान कर,
रचना समझ कर , कवि बन जाता है…

घटा और बादलों को,मेघ संग वादलों को,
अंधेरे को चीर कर , कवि बन जाता है…

छंद कई पढ़ता है, प्रेम गीत गढ़ता है,
तब वो रत्नाकर, कवि बन जाता है…

कविता में ओज भर, युवाओं में जोश भर,
फिर वह दिनकर, कवि बन जाता है…


अभिषेक श्रीवास्तव “शिवाजी”
अनूपपुर मध्यप्रदेश

मैं फिर से बच्चा होना चाहता हूँ

छंदमुक्त बाल गीत

हाँ इनकी शरारतें, हमें बचपन की याद दिलाती हैं,
बीती हुईं यादे जहन में, फिर से वापस आ जाती हैं।

बच्चे तो मन के सच्चे होते हैं, यह कहावत पुरानी है,
ये अबोध है,अनजान हैं, इनमें बहुत सी नादानी है,

कभी बिंदिया लगाते तो कभी श्रंगार कर लेते हैं,
मन पसंद रूप खुद का खुद ही,तैयार कर लेते हैं

बच्चों की शरारतें देख मैं खुद को रोक नहीं पाता हूं,
अठखेलियों में खुद के बचपन की झलक पाता हूं,।

इनके जैसा मैं कोरा और अब सच्चा,होना चाहता हूं।
ख्वाहिश हैं दिल की,मैं फिर से बच्चा होना चाहता हूं।

हाँ!मैं फिर से बच्चा होना चाहता हूँ।

जिम्मेदारियों की जंजीरों से,हम कसतें चलें गये।
ख्वाहिशें बढ़ती गयी,और हम बस चलते चले गये।

वो मासूमियत और ईमानदारी,ना मैं खोना चाहता हूं।
इस झूठ की दुनिया में , मैं फिर सच्चा होना चाहता हूँ।

हाँ! मैं फिर से बच्चा होना चाहता हूँ।

बीती उम्र वापस कोई,लौटा दे ग़र मेरी।
खता बचपन की समझ,माफ़ कर दे मेरी।

तो मैं उन खिलोनों के संग, फिर से खेलना चाहता हूं
दिल कहता है मेरा, मैं फिर से बच्चा होना चाहता हूं…।
हाँ! मैं फिर से बच्चा होना चाहता हूँ।

©अभिषेक श्रीवास्तव “शिवाजी”
अनूपपुर, मध्यप्रदेश

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