अधखिली कली सी तुम अनारकली

अधखिली कली सी तुम अनारकली
अधखिली कली सी तुम अनारकली।
तुम्हें देख कर मन में हो खलबली
बुरा हाल है मेरा जब से तुम्हें देखा ।
तुम्हें अपना बना लेने की मैंने सोच रखा।
जानूं ना तेरी अदाओं को क्या है असली नकली ।
ख्वाबों में मैंने तेरी तस्वीर ही बनाया।
तू ही तू हर लम्हा मेरे ख्यालों में आया ।
तुम ही तुम रहे दिल में बनके मनचली ।।
जहां भी चला जाऊं आ जाए तू उसी जगह ।
प्यार में पागल हो ना जाऊं डरता हूं इसी वजह।
मेरे प्यार की भाषा, जाने अब गली गली ।।
अधखिली कली सी तुम अनारकली

मनीभाई नवरत्न
मनीभाई नवरत्न

📝 कवि परिचय

यह काव्य रचना छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना ब्लाक क्षेत्र के मनीभाई नवरत्न द्वारा रचित है। अभी आप कई ब्लॉग पर लेखन कर रहे हैं। आप कविता बहार के संस्थापक और संचालक भी है । अभी आप कविता बहार पब्लिकेशन में संपादन और पृष्ठीय साजसज्जा का दायित्व भी निभा रहे हैं । हाइकु मञ्जूषा, हाइकु की सुगंध ,छत्तीसगढ़ सम्पूर्ण दर्शन , चारू चिन्मय चोका आदि पुस्तकों में रचना प्रकाशित हो चुकी हैं।

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