अतीत तभी रहता है, जब तुम उसे भोजन देते हो

अतीत तभी रहता है, जब तुम उसे भोजन देते हो

अतीत
लड़ने से नहीं छूटता।
उसे भूलने की कोशिश करना—
उसे पकड़े रहने का
सबसे पक्का तरीका है।

तुम कहते हो—
मैं इसे भूल जाना चाहता हूँ।
और हर दिन
यही कहते हुए
तुम उसे
याद करते रहते हो।

भूलने की इच्छा भी
स्मरण का
एक रूप है।

मन
भूलना जानता है।
आज सुबह से
अब तक
जो कुछ हुआ—
क्या सब याद है?

नहीं।
अधिकांश
अपने आप
गिर चुका है।

मन
भूल सकता है—
यदि तुम
उसे
मजबूर न करो
याद रखने के लिए।

और तुम
मजबूर कैसे करते हो?

महत्त्व देकर।

जिसे तुम
गंभीर मान लेते हो,
वह
मन में
गहरी खुदाई कर लेता है।

इसलिए
प्रश्न यह नहीं है—
मैं कैसे भूलूँ?

प्रश्न यह है—
मैं तुच्छ को
इतना महत्त्व क्यों दे रहा हूँ?

हमारी कठिनाई
यह नहीं कि
हम अतीत याद रखते हैं।

हमारी कठिनाई
यह है कि
हम
तुच्छ को
गंभीर बना लेते हैं—
और
जो वास्तव में
महत्त्वपूर्ण है,
उसे
नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

इसलिए
कचरा याद रहता है,
और
सार
भूल जाता है।

सोचो—
यदि तुम
इस क्षण
किसी अत्यंत महत्त्वपूर्ण
काम में
डूबे हो,
तो क्या
अतीत
आकर
तुम्हें सताएगा?

यदि तुम
किसी विशाल
अर्थ में
तल्लीन हो,
तो क्या
यादें
शोर मचाएँगी?

अतीत
तभी हमला करता है
जब
वर्तमान
खाली होता है।

जब
महत्त्व अनुपस्थित होता है।

इसलिए
खोजो—
क्या महत्त्वपूर्ण है।

और
उसके साथ
टिके रहो।

हर क्षण
अपने आप से पूछो—
इस समय
मेरे लिए
क्या महत्त्वपूर्ण है?

और
उत्तर चाहे
सुखद हो या असुविधाजनक—
उसे
सम्मान दो।

खुद को
नशे में मत डालो।
सुस्ती में मत डुबोओ।

जब भी
तुम देखो
कि कोई चीज़
तुम्हें बहा ले जा रही है—
तो
ईमानदारी से पूछो—

क्या यह
वास्तव में
महत्त्वपूर्ण है?

यदि नहीं—
तो
वह
अपने आप
गिर जाएगी।

और
महत्त्व कैसे पहचाने?

एक प्रश्न और पूछो—
किसके लिए
यह महत्त्वपूर्ण है?

हर चीज़
मेरे लिए
महत्त्व रखती है—
या नहीं रखती।

तो
मापदंड
मैं हूँ।

पर मैं कौन हूँ
इस समय?

एक ऐसा मन
जो
बंधनों में है,
भ्रम में है,
अविवेक में है।

तो
मेरे लिए
वही महत्त्वपूर्ण है
जो
मुझे
स्पष्टता दे,
मुक्ति की ओर ले जाए।

बस।

बाक़ी सब
तुच्छ है।

और
जिस दिन
तुम
महत्त्व को
ईमानदारी से
जीने लगते हो—
अतीत
भूखा पड़ जाता है।

और जो
भूखा रहता है,
वह
ज़्यादा दिन
टिक नहीं सकता।

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