बसंत की पहली साँस
हिंदी कविताबसंत की पहली साँसधीरे से आई…जैसे किसी सोई हुई धरती के कानों मेंकिसी ने प्रेम से फुसफुसाया हो। ठिठुरती हवाओं के काँपते कंधों परजब धूप ने रख दिया अपना गरम हाथ,तभी कहीं दूरकोयल ने पहली बारमन का कोई अधूरा गीत गाया। सूखे पत्तों की थकी हुई सरसराहटअब हरियाली की उम्मीद में बदलने लगी है।कलियों ने


