बाबा साहिब सा सूरमा–राकेश राज़ भाटिया

बाबा साहिब सा सूरमा -राकेश राज़ भाटिया

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महान व्यक्तित्व पर हिन्दी कविता

बदलती रहेगी यह दुनिया, बदलेगा यह दौर ए जहाँ .
न हुआ है, न होगा कभी भी, बाबा साहिब सा सूरमा ..

वो जिसने कक्षा के बाहर बैठकर ज्ञान का दीया जला लिया .
वो जिसने अपनी मेहनत से, विद्या का सागर पा लिया .
वो जिसने संविधान बनाकर बदल दिया विकराल समा .
न हुआ है, न होगा कभी भी, बाबा साहिब सा सूरमा ..

वो न होता तो लोकतंत्र की बुनियादें कच्ची रह जाती .
दलित और शोषित की मन में ही फरियादें रखी रह जाती .
संविधान न करता प्रावधान तो समानता का मंजर होता कहाँ .
न हुआ है न होगा कभी बाबा साहिब सा सुरमा ..

वो अधिकार न दिलवाता अगर महिला कोई न पढ़ पाती .
कोई इंदिरा फिर इस देश की प्रधानमंत्री न बन पाती .
न किसी दलित की बेटी कभी पहुँच पाती विधान सभा .
न हुआ है, न होगा कभी भी, बाबा साहिब सा सुरमा ..

कितने राजा बने यहाँ इंसानों को गुलाम बनाकर .
कितने सम्राट हुए यहाँ मजबूरों पर हुक्म चलाकर .
पर वो बादशाह ऐसा था जिसने बनाया गुलामों को इंसां .
न हुआ है,न होगा कभी भी, भीम राव सा सूरमा ..

-राकेश राज़ भाटिया
थुरल(काँगड़ा)
हिमाचल प्रदेश

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