दंगों से पहले पर कविता

दंगों से पहले पर कविता

दंगों से पहले

शांत महौल था
इस शहर का
दंगों से पहले

नाम निशान
नहीँ था वैर का
दंगों से पहले

अंकुरित नहीँ था
बीज जहर का
दंगों से पहले

सौहार्द-सदभाव का
हर पहर था
दंगों से पहले

न साम्प्रदायिकता
का कहर था
दंगों से पहले

सियासतदानों से
दूर शहर था
दंगों से पहले

असलम रामलाल से
कहाँ गैर था
दंगों से पहले

चुनाव ने ही
घोला जहर था
दंगों से पहले

-विनोद सिल्ला©

बहार
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0 thoughts on “दंगों से पहले पर कविता”

  1. राजेश पाण्डेय ‛अब्र’

    संकेत जितना भो दीजिये नासमझी का पर्दा हटना मुश्किल होता है
    अच्छी रचना हेतु साधुवाद

    ✒️अब्र

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