फ़ैसले से फ़ासला इंसाफ़ का होने लगा/ रेखराम साहू

फ़ैसले से फ़ासला इंसाफ़ का होने लगा

फ़ैसले से फ़ासला इंसाफ़ का होने लगा।
यह तमाशा देखकर फ़रियाद है रोने लगा।।

पाप दामन में बहुत हैं,पर उसे परवाह कब?
गंग वह उल्टी बहाकर दाग़ है धोने लगा।।

इस क़दर उसकी हवस है आसमां को छू रही।
पाँव में पर लग गए जब वह ज़मीं खोने लगा।।

वक़्त था जब आदमी का भार ढोते थे गधे।
अब गधों भार ही है आदमी ढोने लगा।।

बीज पुरखों से गए बोए अमन के बाग़ में।
आज़ दंगा क्यों भला औलाद है बोने लगा।।

जागना था रात में जिस रोज़ चौकीदार को।
बेख़बर बेवक़्त वह उस रात ही सोने लगा।।

हो गया जब पार दरिया तो मुसाफ़िर ने कहा।
नाख़ुदा क़श्ती तुम्हारी दूर कर कोने लगा ।।

रेखराम साहू

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