घाव भी मुस्कुरा सकते हैं
दर्द आएगा—
यह कोई अपवाद नहीं,
यह जीवन का स्वभाव है।
तुम उसे रोकना चाहते हो,
यही तुम्हारी भूल है।
दर्द से नहीं,
दर्द के विरोध से
पीड़ा जन्म लेती है।
जब तुम कहते हो—
“ऐसा नहीं होना चाहिए था”
तभी अहंकार
यथार्थ से लड़ने लगता है।
और वही संघर्ष
दर्द को यातना बना देता है।
दर्द को आने दो।
उसे भीतर उतरने दो।
अपने अस्तित्व को
इतना गहरा बनाओ
कि हर चोट उसमें
डूब जाए,
टूटे नहीं।
जो भागता है दर्द से,
वह कमजोर नहीं होता—
वह उथला होता है।
जो दर्द को देख लेता है
बिना शिकायत,
बिना प्रश्न—
वह जान लेता है
कि वह परिस्थितियों से बड़ा है।
आँसू बहें,
पर आँखें जागी रहें।
होंठ काँपें,
पर भीतर शांति रहे।
यदि रोते हुए
मुस्कुरा सको—
तो वह मुस्कान
भोग की नहीं,
बोध की होगी।
तब समझ में आता है—
घाव भी मुस्कुरा सकते हैं।
और पीड़ा?
वह हमेशा
एक चुनाव थी।
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