कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

प्लमकेक या सत्य?

विरह और दर्द

प्लमकेक या सत्य? थोड़ा-सा दुख आएतोकोई प्लमकेक पकड़ा देता है।कोई तोहफ़ा,कोई सैर,कोई ध्यान-भटकाव। आँसू सूख जाते हैं—समाधान से नहीं,प्रतिस्थापन से। दुख गया नहीं,बसमन बहला दिया गया। यही हैसभ्य दुख का इलाज—रो लो थोड़ा,फिर मुस्कुरा लो। कई बारदुख इसलिए भी आता हैक्योंकितुम्हें प्लमकेक चाहिए।ध्यान चाहिए।सांत्वना चाहिए। यह दुखपरिवर्तन नहीं करता,यह माँग करता है।यह अहंकार कीएक और

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ईर्ष्या: उधार ली हुई पहचान का दर्द

विरह और दर्द, हिंदी कविता

“ईर्ष्या: उधार ली हुई पहचान का दर्द” ईर्ष्याकिसी और से नहीं होती,ईर्ष्याखुद से होती है—जब खुदउधार का हो। मैं नहीं जानतामैं कौन हूँ,तोतुमसे पूछता हूँ। तुम कहते हो—“तुम बहुत अच्छे हो,”और मैंअच्छा हो जाता हूँ। मेरी पहचानतुम्हारे मुँह मेंलटक जाती है। पर उसी मुँह सेजब तुमकिसी और कीतारीफ़ कर देते हो,तोकुछ भीतर टूट जाता है।

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प्रेरणा क्यों विफल होती है

प्रेरणा और सकारात्मकता, हिंदी कविता

तुम्हें प्रेरणा नहीं चाहिए,तुम्हें बोध चाहिए।धक्का नहीं,खींच नहीं—भीतर की वह चाबीजो पहले से तुम्हारे पास है। प्रेरणाहमेशा बाहर से आती है—कोई भाषण देता है,मन गरम हो जाता है।कोई फ़िल्म देखी,सीना भर आया।किताब बंद हुई,जोश भी बंद। यह तुम्हारी ऊर्जा नहीं थी,यह उधार थी।और उधार की आगज्यादा देर नहीं जलती। बाहरी शक्तितुम पर काम करती है,तुम

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व्यक्ति से प्रेम या कल्पना के भूत से?

विरह और दर्द, हिंदी कविता

व्यक्ति से प्रेम या कल्पना के भूत से? हमलोगों से प्रेम नहीं करते,हमअपनी ही कल्पनाओं केभूतों से प्रेम करते हैं—जब तकयथार्थबुलबुले कोफोड़ नहीं देता। देखो—अनुभवहर दिनहमें कैसेछलता है। वह सामने खड़ी है,और तुमकसम खाते हो—दुनिया कीसबसे सुंदर स्त्री है। यहउसका सौंदर्य नहीं,तुम्हारीदृष्टि काभ्रम है। हमआत्म-छल मेंडूबे रहते हैं।यहाँ तक किजब हम सोचते हैंकिसाधारण लोगों कोदेख

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लगाव आज़माया? अब प्रेम आज़माओ

विरह और दर्द, हिंदी कविता

लगाव आज़माया? अब प्रेम आज़माओ किसी कमरे मेंकाफी देर रह लो,तो कमराअपना लगने लगता है। कमीज़ पहनोकुछ समय तक,गाड़ी चलाओबरसों—औरपहचानजुड़ जाती है। ताँबा और जस्तासाथ पड़े रहें,तोआपस मेंघुलने लगते हैं। क्याइसेप्रेम कहोगे? लगावअच्छा लगता है,सुकून-सा देता है।परज़रा शांति सेदेखो— उसके साथडर आता है,हिंसा आती है,लालच,भ्रम,ऊब,अकेलापन,शक—सबएक साथ। लगावप्रेम जैसालगता है,परक्या वहहमेशाअपने बारे मेंनहीं होता? जहाँमैं केंद्र

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Mr. Hormones Again!

हास्य और व्यंग्य, हिंदी कविता

Mr. Hormones Again!(अतुकांत हिंदी कविता – भावानुवाद) जिसे आम तौर परप्रेम कहा जाता है,वह अक्सरकविता नहीं होता—वहहार्मोनों काधमाका होता हैजोरोमांस कावेश पहन लेता है। प्रेमउसी क्षणखो जाता हैजब तुमरसायन कोईश्वर समझ लेते हो। क्या तुमने कभीकिसी कोईमानदारी से कहते देखा है—“तुम्हें देखकरमेरे हार्मोनबेहद सक्रिय हो जाते हैं”? नहीं।कोई ऐसा नहीं कहता।अधिकतरखुद को भीपता नहीं होता।

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दर्द तब होता है जब कल्पना टूटती है

विरह और दर्द, हिंदी कविता

Hurt Is When Fantasy Breaks(अतुकांत हिंदी कविता – भावानुवाद) चोटअचानक नहीं लगती,वह उसी जगह लगती हैजहाँतुम्हारा लगावसबसे गहरा होता है। अगर दुख है,तो उसेभाग्य या दूसरे पर मत डालो—अपनेआसक्ति को देखो। दर्दकिसी घटना का नाम नहीं,वह उस कहानी का टूटना हैजिसे तुमचुपचापपाले हुए थे। एक तस्वीर थी,एक उम्मीद थी,एक विश्वास था—और यथार्थ नेउसे मानने सेइनकार

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प्रेमहीन काम, आनंदहीन जीवन

प्रेम और रिश्ते, हिंदी कविता

प्रेमहीन काम, आनंदहीन जीवन अगर कामप्रेम योग्य नहीं है,तो जीवनजीने योग्यकैसे होगा? कामदिन की एक फ़ाइल नहीं,वहतुम्हारी पहचान की धुरी है—दिन उसी के इर्द-गिर्द घूमते हैं,सोच उसी से आकार लेती है,रिश्तेउसी की छाया में साँस लेते हैं। काम को छोटा समझनाअपने अस्तित्व केकेंद्र को नकारना है। जहाँ तुम खड़े होऔर जो तुम करते हो—उनके बीचफाँक

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जीवन भरो, वरना वह खुद भर जाएगा

हिंदी कविता

जीवन भरो, वरना वह खुद भर जाएगा अगर तुमअपने जीवन कोऊँचाई से नहीं भरोगे—आनंद से,बोध से,सौंदर्य से,पवित्रता से—तो जीवनखुद को भर लेगा। और वह भरेगाकचरे से। कभी नौकरी के नाम पर,कभी रिश्तों के बोझ में,कभी किसी और शोर में—जो दिखेगा ज़रूरी,पर होगा खोखला। मनुष्यआलस्य के लिए पैदा नहीं हुआ।वहसंघर्ष में जन्म लेता है।पूरा जीवनएक रणभूमि

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पुरुष को एक ओर रखो

आध्यात्म और भक्ति, हिंदी कविता

पुरुष को एक ओर रखो स्त्री के संसार का केंद्रपुरुष नहीं होना चाहिए,और पुरुष के संसार का केंद्रस्त्री नहीं। यह व्यवस्थाजंगल की है,मनुष्यता की नहीं। जब तकशरीर, हार्मोन,मातृत्व,और घोंसलाजीवन का केंद्र बने रहते हैं,मुक्तिकेवल शब्द रह जाती है। जिस दिनशरीर मालिक नहीं रहता,उसी दिनपुरुष भीआसक्ति नहीं रहता। रुको,और खुद से पूछो—जिसे तुमइतना महत्वपूर्ण मान रही

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समस्या सेक्स नहीं, खालीपन है

समाज और यथार्थ

समस्या सेक्स नहीं, खालीपन है सेक्स समस्या नहीं है।समस्या है—भीतर का खालीपन। जब तुम नहीं जानतेकि तुम कौन हो,तब इच्छातुम्हें खींचती है,घसीटती है,शासित करती है। सेक्ससरल है,जैविक है।पर आसक्ति—जटिल है,मानसिक है। तुम भूखे हो,पर यह भूखदेह की नहीं।तुम्हें लगता हैसेक्स तृप्त करेगा—पर वह वादा करता है,पूरा नहीं करता। हम बिना आत्म-बोध के जीते हैं।और उसी

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मज़ाक के सिवा कुछ स्थायी नहीं

हास्य और व्यंग्य, हिंदी कविता

मज़ाक के सिवा कुछ स्थायी नहीं(Nothing Lasts but the Joke) किसी को“परे”,“अटल”,“सदैव”का दर्जा मत दो। यहाँकुछ भीअविनाशी नहीं। दिखाओ मुझे—जो आज जैसा हैवैसा हीकल भी रहे। दिखाओ मुझे—जो तुम्हारी उम्मीदों सेकभी विश्वासघात न करे। बुद्धिमान जानता है—स्थितियाँ खेल हैं।आज यह,कल कुछ और। वे किसी की नहीं होतीं।न वफ़ादार,न प्रतिबद्ध।क्षणिक—जुगनू की रोशनी जैसी। ध्यान से देखो—जो

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