पत्ता, पेट और पृथ्वी

हम खड़े हैं एक ऐसे समय में
जहाँ सवाल
रोटी बनाम रोज़गार का नहीं,
रोटी बनाम भविष्य का है।
तेंदूपत्ता अब केवल पत्ता नहीं रहा—
वह नीति है, मजबूरी है,
हमारी सामूहिक चुप्पी का
हरा दस्तावेज़ है।
मनुष्य कहता है—
मेरे बच्चे हैं,
मेरी भूख है,
विकल्प नहीं मेरे पास ।
जबकि
विकल्प हमेशा होता है,
बस हम टालते रहते हैं उसे।
जो जलती है बीड़ी
वो केवल तंबाकू नहीं रहता,
मनुष्य का एक हिस्सा भी
धुएँ में बदल जाता है।
हम तंबाकू को
रोज़गार कहकर
नैतिक बना लेते हैं
और मृत्यु को
स्वास्थ्य-रिपोर्ट की भाषा में
छुपा देते हैं।
यह मापदंड दोहरा है
जिसमें एक हाथ से
बेचा जाता है ज़हर
और दूसरे हाथ से
इलाज बाँटा जाता है।
प्रश्न है –
क्या कल्याण
किसी के फेफड़े जलाकर
हो सकता है?
जंगल चुप है
लेकिन निर्जीव नहीं।
वह मात्र संसाधन नहीं,
सहचेतना है।
उस पर लगाई गई आग
केवल पत्ते नहीं गिराती,
धरती का ताप बढ़ाती है,
भ्रमित करती है ऋतुओं को,
और असंतुलित कर देती है
भविष्य को।
ग्लोबल वार्मिंग
धरती की बीमारी नहीं,
मनुष्य की जीवनशैली का
एक्स-रे है।
अगर सच में कोई
जनपक्षधर है
तो सवाल तेंदूपत्ता का नहीं,
निर्भरता का होना चाहिए।
क्यों आज भी
गरीब की रोज़ी
नशे के सहारे टिकी है?
क्यों विकल्प
वादों में उगते हैं
और ज़मीन पर
जड़ नहीं पकड़ते?
बाँस है,
लाख है,
महुआ है,
वन औषधियाँ हैं,
कार्बन की दुनिया में
हरा रोजगार है—
लेकिन नीति
अब भी सबसे आसान रास्ता
धुएँ से होकर चुनती है।
तंबाकू नियंत्रण
केवल चेतावनी की तस्वीर नहीं,
उत्तरदायित्व है समाज का ।
बीड़ी बंद नहीं तो
कम तो करो ।
मांग घटाओ
पर हाथ खाली मत छोड़ो।
नशा नहीं, कौशल दो।
धुआँ नहीं,बाज़ार दो।
यह प्रार्थना नहीं,
सीधी बात है—
उपदेश नहीं,
दिशा चाहिए।
हर साल
तेंदूपत्ता पर निर्भरता घटे—
यह नारा नहीं,
कार्ययोजना बने।
हर जंगल के साथ
आजीविका हो एक वैकल्पिक,
हर नियंत्रण नीति के साथ
एक रोजगार जुड़ा हो
सम्मानजनक ।
यह संघर्ष
पत्ता बनाम पेट का नहीं,
पेट के साथ
पृथ्वी बचाने का है।
अगर आज
नहीं बदला हमने रास्ता,
तो कल
ना बचेगा जंगल,
ना रोज़गार,
ना मनुष्य।
और तब
इतिहास यह नहीं पूछेगा
कि हमने क्या खाया,
वह लिखेगा—
मनुष्य ने भूख के नाम पर
अपनी घर ही खा ली।
- मनीभाई नवरत्न





