सवाल ही पहली क्रांति
हुकूमत करने वाले
सिर्फ़ दो-चार,
कुर्सी पर बैठे,
कलम और बंदूक के सहारे
अपने को विशाल समझते हैं।
मानने वाले
हज़ारों नहीं,
लाखों में—
फिर भी सिर झुकाए,
नज़रें ज़मीन पर टिकी हुई।
डर की भाषा
सबको समझाई जाती है—
कभी नौकरी का डर,
कभी रोटी का,
कभी जेल का,
तो कभी बदनामी का।
शासन तलवार से नहीं चलता,
चलता है
दिलों में भरे गए डर से।
दो-चार आवाज़ें
जब गूँजती हैं,
तो हुकूमत काँपती है—
इसलिए
खामोशी को इनाम
और सवाल को सज़ा दी जाती है।
पर सच यही है—
डर की उम्र लंबी नहीं होती,
जिस दिन
हज़ार मानने वाले
सोचना शुरू कर दें,
उस दिन
दो-चार हुकूमत करने वाले
इतिहास बन जाते हैं।
अब वक्त है
कि मानने वाले
गिनती नहीं,
अपनी ताक़त पहचानें।
डर से बाहर निकलकर
सवाल पूछना सीखें,
क्योंकि
सवाल ही पहली क्रांति है।
जब एक बोलता है
तो उसे दबाया जाता है,
लेकिन
जब हज़ार बोलते हैं
तो इतिहास लिखा जाता है।
जन-क्रांति
न आग से जन्म लेती है,
न पत्थर से—
वह जन्म लेती है
विचार से,
एकजुटता से,
और सच बोलने के साहस से।
कदम दर कदम
खामोशी टूटेगी,
गलियों से संसद तक
आवाज़ पहुँचेगी।
आज जो डर सिखाया गया है,
कल वही डर
हुकूमत की नींद उड़ाएगा।
क्योंकि
जब जनता जागती है,
तो तख़्त नहीं गिरते—
झूठ गिरते हैं,
भय गिरता है,
अन्याय गिरता है।
और तब
दो-चार हुकूमत करने वाले नहीं,
लाखों जन
अपने भविष्य के
शासक बनते हैं।
यही जन-क्रांति है—
शांत, सचेत,
और अटल।
मनीभाई नवरत्न





