भावनाओं को कुछ ऐसा उबाल दो- रामकिशोर मेहता

भावनाओं को कुछ ऐसा उबाल दो भावनाओं को कुछ ऐसा उबाल दो।जनता न सोचेसत्ता के बारे में,उसके गलियारे में,नित नयेसवाल कुछ उछाल दो। खड़ा कर दोनित नया उत्पात कोई।भूख और प्यास कीकर सके न बात कोई।शान्ति से क्यों सांस ले रहाकोई शहर।घोल दो हवाओं मेंनित नया जहर। अट्टालिकाओं की तरफउठे अगरकोई नजरदूर सीमाओं पर उठा …

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