22 सितंबर जनचेतना दिवस पर हिंदी कविता

Poverty

लूटती जनता पर कविता – कमल कुमार आजाद

करोना काल में लोग किस तरह से परेशान हुए जनता की वेदना को महसूस किया गया और उसको कविता के रूप में लिखा गया है यह मौलिक अप्रक्षित रचना मेरे द्वारा लिखी गयी है |

नारी पर दोहे- डिजेन्द्र कुर्रे”कोहिनूर”

नारी पर दोहे ★★★★नारी की यशगान हो ,नारी की ही रूप ।नारी के सहयोग से,मिलते लक्ष्य अनुप।। नारी बिन कब पूर्ण है?एक सुखी परिवार।नारी जो सुरभित रहे, सुखी रहे संसार।। जग में जो करता नहीं , नारी का सम्मान।कहलाये वह क्यो मनुज ,वह है पशु समान।।★★★★★★★★★★★★★रचनाकार – डिजेन्द्र कुर्रे”कोहिनूर”

नशा पर कविता- नशा शराबी जब तजे करे जगत सत्कार-रमा

नशा पर कविता देख शराबी की दशा, नशा करे मदमस्त।अपने तन की सुध नहीं, करता जीवन ध्वस्त।। नित्य शराबी मद्य का, करता है रसपान।लोग सदा निंदा करें, पाता जग अपमान।। पत्नी बच्चे हैं दुखी, देख शराबी चाल।नोंक झोंक घर में चले, मचता अजब धमाल।। नशा शराबी के लिए, श्रेष्ठ पेय है जान।उसके लत में डूबकर, …

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शर्म करें गरीबी पर- मनीभाई ‘नवरत्न’

शर्म करें गरीबी पर – मनीभाई ‘नवरत्न’ बहुत गर्व है अपने भारत पर पर आओ,थोड़ा बहुत शर्म करें गरीबों की गरीबी पर ।हल नहीं है ,सिक्का थमा देना उन हाथों को,जिन्हें चाहिए रोटी ,जिनकी किस्मत है खोटी।तो कैसे मिलेगा इंसाफ?फुटपाथ में या गटर में या फिर इंसानों के हेय नजर में ।चुंकि फुर्सत तो नहींसभ्य समाज कोशिक्षा स्वास्थ्य के घोटाले मेंअपनी …

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विश्वास पर कविता-बाबूलालशर्मा विज्ञ

विश्वास पर कविता सत्ताधीशों की आतिश से,जलता निर्धन का आवास।राज महल के षडयंत्रों ने,सदा छला जन का विश्वास। युग बीते बहु सदियाँ बीती,चलता रहा समय का चक्र।तहखानों में धन भर जाता,ग्रह होते निर्बल हित वक्र।दबे भूलते मिले दफीने,फलती मचली मिटती आस।राज महल के षडयंत्रों ने,सदा छला जन का विश्वास। सत्ता के नारे आकर्षक,क्रांति शांति के …

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सृजन पर कविता-बाबू लाल शर्मा,बौहरा

सृजन पर कविता सृजन कर्म सूरज करे, सविता कह दें मान।चंद्र धरा की रोशनी, जग मण्डल की शान।। दूजी सृजक वसुंधरा, जिस पर निपजे जीव।सृजन करे जल संग से, बरसे अम्बर पीव।। उत्तम सृजक किसान है, भरता सब का पेट।अन्न फसल फल फूल से, चाहे वन आखेट।। कृष्ण राधिका रास भी, जिसे न आए रास।अश्व …

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HINDI KAVITA || हिंदी कविता

प्राण जाए तो जाए पर व्यंग्य कविता

प्राण जाए तो जाए पर व्यंग्य कविता प्राण जाए तो जाए , फेर दारू तो मिल जाए !कइसे जल्दी जुगाड़ होही, कोई ये तो बताए !! अब्बड़ दिन म खुले हावे, दारू भट्टी के दुवारी !जी भर के मेहा पीहू, भले गारी दे मोर सुवारी !!लकर धकर सूत ऊठ के आंखी रमजत जात हे !खखाए …

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