बसंत

.           *पंचचामर छंद* 
.              *विधान*:–
१२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ (आठ बार)
१२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ (आठ बार)
दो दो चरण सम तुकांत हो,
चार चरण का छंद होता है।
.                 *बसंत* 
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बसंत दूत कोकिला, विनीत मिष्ठ बोलती।
बखान रीत गीत से, बसंत गात  डोलती।
बसंत  की  बहार में, उमा महेश साथ  में।
बजाय कान्ह बाँसुरी,विशेष चाल हाथ में।
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दिनेश  छाँव  ढूँढते , सुरेश  स्वर्ग  वासते।
सुरंग  पेड़  धारते, प्रसून  काम    सालते।
कली खिले बने प्रसून, भृंग संग  सोम से।
खिले विशेष  चंद्रिका  मही रात व्योम से।
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पपीह मोर  चातकी  चकोर शोर काम के।
बसंत  बाग  फाग में  बहार बौर आम के।
बटेर   तीतरी  कपोत, कीर  काग  बावरे।
लता  लपेट खाय, पेड़ मौन कामना  भरे।
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निपात होय पेड़ जोह बाट फूल पात की।
विदेश पीव  है, बसंत याद आय  पातकी।
स्वरूप  ये  मही सजे, समुद्र छाल  मारते।
पलंग शेष  क्षीर सिंधु,विष्णु श्री विराजते।
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मचे  बवाल कामना, पिया पिया पुकारते।
बढ़े, सनेह  भावना, बसंत  काम  भावते।
निराश नहीं छात्र हो, नवीन पाठ सीखते।
बसंत  के  प्रभाव  गीत चंग संग  दीखते।
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मने , बसंत  पंचमी, मनाय  मात  शारदा।
मिटे समस्त कामना,पले न घोर  आपदा।
विवेक शील ज्ञान संग  आन मान शान दे।
अँधेर नाश  मानवी प्रकाश स्वाभिमान दे।
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बसंत  की  उमंग    संग  पूजनीय  शारदे।
किसान भाग्य खेल मात कर्ज भार तारदे।
फले चने  कनेर  आम  कैर बौर  खेजड़ी।
प्रसून खूब  है खिले शतावरी खिले जड़ी।
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पके अनाज,खेत में  कपोत  कीर  तारते।
नसीब, हाय होलिके, हँसी खुशी पजारते।
विवाह साज  साजते, विधान ईश  मानते।
समाज के विकास को,सुरीत प्रीत पालते।
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विशेष शीत मुक्ति से,सिया समेत राम से।
घरों समेत खेत के, सुकाम मे सभी  लसे।
विशाल भाल भारती,नमामि मात आरती।
हिमालयी  प्रपात  नीर  मात गंग  धारती।
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अखंड  देश  संविधान  वीर  रक्ष  सर्वदा।
प्रणाम है शहीद को, नमामि  नीर  नर्मदा।
बसंत  की उमंग, फाग संग छंद  भावना।
सुरंग भंग  चंग  मंद  मोर  बुद्धि  मानना।
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.          बाबू लाल शर्मा °बौहरा”
.        सिकंदरा, दौसा,राजस्थान
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