सच्चा प्रेम कभी संयोग नहीं होता
संस्कारों में जकड़ा
मन
प्रेम को
जान ही नहीं सकता।
“मैं तुम्हें
हमेशा प्रेम करूँगा”—
अक्सर
इसका अर्थ होता है:
जब तक
तुम मुझे
सुख देते रहो।
जिसे
हम प्रेम कहते हैं,
वह
अक्सर
शर्तों का
गठ्ठर होता है—
और
वह
उसी समय तक
ज़िंदा रहता है
जब तक
परिस्थितियाँ
अनुकूल रहती हैं।
सुनकर
चुभता है न?
सदियों से
तारे गवाह रहे हैं—
हाथों में हाथ,
आँखों में सपने,
आवाज़,
शरीर,
रंग,
आकृति से
मोहित
लोगों ने
अनंतता की
कसम खाई।
और
फिर
इतना जिए
कि
स्वयं स्वीकार कर सकें—
वह वचन
खोखला था।
यह है
सशर्त प्रेम—
मौसम अच्छा हो
तो प्रेम,
मन मीठा हो
तो प्रेम,
लाभ बराबर हों
तो प्रेम।
पर
ज्यों ही
मौसम बदला,
मन कड़वा हुआ,
हिसाब बिगड़ा—
प्रेम का
भ्रम भी
टूटने लगा।
निःशर्त प्रेम
तभी संभव है
जब
क्षणभंगुर से
चिपकने की
निरर्थकता
दिखने लगे।
जब
इतना साहस आए
कि
स्वीकार कर सको—
बुलबुलों के पीछे
दौड़ना
कुछ देर
मनोरंजक है,
पर
साबुन और हवा पर
जीवन नहीं टिकता।
जब
संयोग को
अस्वीकार करते हो,
आकस्मिक को
छोड़ते हो,
परिस्थिति से
परे देखते हो—
तभी
कुछ वास्तविक
हाथ लगता है।
तभी
प्रेम
लेन-देन नहीं रहता,
वह
प्रकाश बन जाता है।
संयोग से
मुक्ति
यहीं से शुरू होती है।
न आकर्षण।
न लगाव।
प्रेम।





