The Stainless Mind
प्रतिक्रिया नहीं—
सचेत उत्तर चाहिए,
जहाँ मन उछलता नहीं,
ठहरकर देखता है।
उकसावे से नहीं,
स्पष्टता से जन्मे कर्म—
तीव्र हों, सुंदर हों,
पर मजबूरी से नहीं।
जो तुरंत भड़कता है,
वह अपना नहीं रहता,
उसके कर्म
दूसरों की चिंगारियों की
उधार ली हुई आग होते हैं।
घाव, घाव को जवाब देता है—
यही तो कैद है,
न मौलिकता,
न स्वतंत्रता।
मन भी एक पात्र है,
जिसमें जीवन पकता है—
तेल, मसाले, अनुभव।
कमज़ोर पात्र में
सब चिपक जाता है।
रसायन कहता है—
बंधन बन गया।
अध्यात्म कहता है—
बंधन नहीं,
बंधक बन गए।
अस्थिरता से
जुड़ाव जन्म लेता है,
अधूरापन
चिपकने की आदत बन जाता है।
पर जैसे
हम बेहतर बर्तन चुनते हैं—
नॉन-स्टिक,
स्टेनलेस—
वैसे ही
मन को भी शिक्षित किया जा सकता है।
वही जीवन,
वही परिस्थितियाँ,
पर अब
कुछ टिकता नहीं।
मन कर्म करता है,
डूबता नहीं।
जुड़ता है,
फँसता नहीं।
यही है
निर्लेप मन—
जो पूरी तरह जीता है,
और फिर
स्वच्छ लौट आता है।
यही स्वतंत्रता है।
यही
The Stainless Mind.





