उधार की रोशनी के पार
(Beyond Borrowed Light)
(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, विचारोत्तेजक अतुकांत कविता)
सबसे गहरी जिज्ञासा
कठोर प्रश्न से शुरू होती है—
और
विनम्र मौन में
समाप्त होती है।
हम जाँचते नहीं,
मान लेते हैं।
किसी पुराने धर्माचार्य ने कहा—
तो सच होगा।
किसी अमीर,
किसी सत्ता-शिखर,
किसी प्रसिद्ध चेहरे ने बोला—
तो सही ही होगा।
घर की परंपरा है,
समाज की रीति है—
इसलिए
हम झुक जाते हैं।
पर क्या
हम कभी
निर्भय होकर
तथ्य तक जाते हैं?
क्या हम
सच में देखते हैं?
हम
आशाओं में जीते हैं,
विश्वासों में,
सिद्धांतों में।
हमारी दृष्टि
अंधेरे से नहीं,
उधार की रोशनी से
ढकी हुई है।
खुद से पूछो—
यह सब क्या है?
दुनिया
ढह रही हो सकती है।
भीड़
घबराकर चिल्ला रही हो।
अंधे आत्मविश्वास
दौड़ते झुंड की तरह
रौंदते चले आ रहे हों।
उनके साथ मत भागो।
रुको।
स्थिर खड़े रहो।
पूछो—
यह सब क्या है?
यह कहाँ से आ रहा है?
मन
इच्छा से जल रहा हो,
क्रोध से उबल रहा हो।
तुम्हें पूरा विश्वास हो
कि अभी
कुछ करना ही होगा।
पर मत कहो—
“मैं यही करना चाहता हूँ।”
पूछो—
यहाँ
असल में हो क्या रहा है?
ये आवेग
कहाँ से उठे हैं?
क्या मुझे
वाकई पता है
मैं क्या कर रहा हूँ?
और जब
तुम बोलने लगो,
तो रुककर पूछो—
मैंने अभी क्या कहा?
क्या मैं
इन शब्दों को
समझता भी हूँ?
बस
इतना करते ही—
तुम घर लौट आते हो।
क्योंकि
जहाँ सच्ची जिज्ञासा शुरू होती है,
वहाँ मन
ढीला पड़ता है—
आलस्य में नहीं,
अपने स्वाभाविक रूप में।
स्पष्ट।
दीप्त।
शांत।
उधार की रोशनी
छूट जाती है—
और
देखना
खुद का हो जाता है।





