समाज और यथार्थ

मन का अबीर

मन का अबीर: समकालीन विद्रूप पर एक हिंदी कविता

समाज और यथार्थ

इस कविता में: ‘मन का अबीर’ शीर्षक के अंतर्गत आधुनिक समाज के खोखलेपन और दिखावे पर कटाक्ष करती यह हिंदी कविता मानवीय संवेदनाओं के असली रंगों की तलाश करती है। भूमिका होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि अंतर्मन के उन धूसर कोनों को रंगने का अवसर है, जहाँ नैतिकता और संवेदनाएं जमी हुई हैं। […]

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मार्च 2026 फाल्गुन चैत्र माह वसंत और होली पर आधारित प्रेरक कविता

रंगों की क्रांति: जागती चेतना की हिंदी कविता

समाज और यथार्थ

इस कविता में रंगों की क्रांति हिंदी कविता में समाज की चेतना, परिवर्तन की पुकार और मनुष्य की जागती आत्मा का ओजपूर्ण चित्रण किया गया है। भूमिका कभी-कभी इतिहास केवल शब्दों से नहीं बदलता,वह बदलता है रंगों से —क्रोध के लाल से, शांति के सफेद से, आशा के हरे से, और संघर्ष के केसरिया से।

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माँ से मंगल तक: नारी की अनंत उड़ान

आधी दुनिया की आवाज़: हिंदी कविता का ओजपूर्ण घोष

समाज और यथार्थ

इस कविता में इस कविता में आधी दुनिया की आवाज़ को नारी चेतना, समान अधिकार, आत्मसम्मान और समकालीन सामाजिक संघर्षों के रूप में स्वर दिया गया है। यह हिंदी कविता समाज को आईना दिखाती है। भूमिका आधी दुनिया की आवाज़ सदियों से दबाई गई, पर वह कभी मिटी नहीं। वह घर की चौखट से संसद

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💖 प्रेम और करुणा / मनीभाई नवरत्न

प्रेम और रिश्ते, समाज और यथार्थ, हिंदी कविता

प्रेम और करुणा पर प्रेरक हिंदी लेख। जानिए कैसे सच्चा प्रेम करुणा में बदलकर जीवन को सकारात्मक और अर्थपूर्ण बनाता है।

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चूल्हे से चौपाल तक / समर्पित सरोजिनी नायडू की जयंती – 13 फरवरी

समाज और यथार्थ

चूल्हे से चौपाल तक राष्ट्रीय महिला दिवस (भारत) पर अतुकांत कविता (समर्पित सरोजिनी नायडू की जयंती – 13 फरवरी) 4 चूल्हे की आँच मेंसदियों से तपती रही एक देहपर उस देह मेंएक स्वप्न भी था—जो धुएँ से ऊपर उठना चाहता था। वह सिर्फ रोटी नहीं सेंकती थी,वह समय को गूँथती थी,आटे में मिलाती थीसंघर्ष की

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पत्ता, पेट और पृथ्वी

पत्ता, पेट और पृथ्वी / मनीभाई नवरत्न

समाज और यथार्थ

पत्ता, पेट और पृथ्वी हम खड़े हैं एक ऐसे समय मेंजहाँ सवालरोटी बनाम रोज़गार का नहीं,रोटी बनाम भविष्य का है।तेंदूपत्ता अब केवल पत्ता नहीं रहा—वह नीति है, मजबूरी है,हमारी सामूहिक चुप्पी काहरा दस्तावेज़ है। मनुष्य कहता है—मेरे बच्चे हैं,मेरी भूख है,विकल्प नहीं मेरे पास ।जबकिविकल्प हमेशा होता है,बस हम टालते रहते हैं उसे।जो जलती है

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jeb aur jism

“जेब और जिस्म की शादी”

समाज और यथार्थ

“जेब और जिस्म की शादी” शादी—एक ऐसा शब्दजिसके भीतर प्रेम से ज़्यादाभ्रम रहता है।हम सोचते हैंहम किसी व्यक्ति को चुन रहे हैं—पर सच मेंहम उसके भीतर नहीं देखते,सिर्फ़ उसकी सतह को नापते हैं। लड़की की दृष्टिलड़के की जेब में उतरती है—वह भविष्य नहीं ढूँढती,भविष्य की गारंटी ढूँढती है।जैसे मनुष्य नहीं,एक बीमा पॉलिसी चुन रही होजिस

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कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ

समाज और यथार्थ

यह कविता आधुनिक समाज की सोच, जीवन-शैली और दिखावटी प्रगति पर तीखा, व्यंग्यात्मक और विचारोत्तेजक प्रहार है। कवि आज के व्यक्ति को आईना दिखाता है, जो तकनीक, ट्रेंड और तथाकथित सफलता में उलझकर जीवन के मूल अर्थ से दूर होता जा रहा है।

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लाओ–सू : मार्ग का महागुरु -मनीभाई नवरत्न

समाज और यथार्थ

लाओ–सू : मार्ग का महागुरु प्राचीन चीन के धूसर बादलोंऔर शांत पर्वतों के बीचएक आत्मा जन्मी—जिसे संसार ने पुकारा—लाओ–सू,अर्थात् “आदरणीय वृद्ध गुरु”। इतिहास धुँधला है,समय की धूल पन्नों पर जमी है—कुछ कहते—वह मिथक था,कुछ कहते—कई महान आत्माओं काएक संयुक्त स्वरूप।पर सत्य यह है—ज्ञान जब जन्म लेता है,तो व्यक्ति नहीं, विचार बनकर जीता है। कहते हैं—वह

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स्वामी दयानन्द सरस्वती

स्वामी दयानन्द सरस्वती – मनीभाई नवरत्न

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स्वामी दयानन्द सरस्वती – मनीभाई नवरत्न उन्नीसवीं शताब्दी के धूमिल क्षितिज परजब राष्ट्र की आत्मा अंधकार में ढंकी थी,जब मनुष्य की चेतना जड़ता के बोझ तले दबी थी,तभी एक तेजस्वी दीप्ति उठी—संस्कारों में तप्त, ज्ञान में प्रखर,जो स्वयं प्रकाश बनकर जनमन में आशा की लौ जलाने आया। टंकारा की मिट्टी में जन्मा मूलशंकरकेवल बालक नहीं,

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डा० भीमराव अम्बेडकर – मनीभाई नवरत्न

समाज और यथार्थ

डा० भीमराव अम्बेडकर अत्यंत साधारण जीवन में जन्मा एक बालक,जिसके पाँवों में जमी धूल भीएक दिन भारतीय लोकतंत्र की नींव बनने वाली थी। 14 अप्रैल 1891 —रत्नागिरि की उसी धरती पर,जहाँ जाति की दीवारेंइंसान को इंसान होने नहीं देती थीं,वहीं पैदा हुआ भीमराव,जिसे दुनिया बाद में‘बाबासाहेब’ कहकर प्रणाम करने वाली थी। गरीबी, भेदभाव, उपेक्षा—ये उनके

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“एक ही चेहरा” — मनीभाई नवरत्न

समाज और यथार्थ

🌓 “एक ही चेहरा” — मनीभाई नवरत्न विश्वास —एक नज़र है,जो देखना नहीं चाहती,सुनना भी नहीं,जो अपने भीतर के मौन कोईश्वर का उत्तर समझ बैठती है। जब तू हाथ जोड़ता है,तो ईश्वर मुस्कुराता है —पर जब तू सवाल छोड़ देता है,तो वही मुस्कानडर में बदल जाती है। धार में बहा दिया गया नारियल,पूजा की थाली,एक

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