समाज और यथार्थ

झूठ के लिए चमकने से बेहतर है सत्य के लिए लहूलुहान होना

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झूठ के लिए चमकने से बेहतर है सत्य के लिए लहूलुहान होना हारअसफलता नहीं होती।सबसे बड़ी हार है—यह जानकर भीकि युद्ध योग्य है,पीठ फेर लेना। उत्कृष्ट बनने से पहलेपूछो—किसमें? तेज़ चलने से पहलेपूछो—किस दिशा में? गति बाद में आती है।दिशा पहले। गलत राह पर उड़ने से बेहतर हैसही रास्ते पररेंगना। सही चुनाव करनासही चुनाव मेंपरफेक्ट

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प्रोग्राम की गई भावनाएँ

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प्रोग्राम की गई भावनाएँ भावनाएँजन्मजात नहीं होतीं—वेसंस्कारों की भाषा हैं। सोचजैसेमानसिक ढर्रों सेउगती है,वैसे हीभावशरीर और समाज कीजमी हुईलकीरों सेफूटते हैं। भाव उठेउससे पहले हीरसायनअपना कामशुरू कर चुके होते हैं। हार्मोनघंटी बजा देते हैं—और मननाम दे देता है। भावनासोच सेगहरी लगती हैक्योंकिउसमेंदेह का वजन है। इसीलिएवहअपरिहार्य,पवित्र,“दिल से निकली”महसूस होती है। परयह भ्रम है। क्रोध,भय,कामना,आसक्ति—येजंगल की

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विचलन नहीं जीतते, कमजोर लक्ष्य हारते हैं

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विचलन नहीं जीतते, कमजोर लक्ष्य हारते हैं यदि लक्ष्यतुम्हें पकड़ नहीं पाता,तो दुनियातुम्हें खींच लेती है। विचलन दोषी नहीं हैं।वे बस यह बता रहे हैंकि लक्ष्यनिर्जीव है। अगर बार-बारध्यान की याद दिलानी पड़े,तो समझ लो—हृदय वहाँ नहीं है। कमजोर लक्ष्यमन को भटकने कानिमंत्रण देता है।यह समस्या नहीं,लक्षण है। ऐसा लक्ष्य चुनोजो तुम्हारी ढाल बन जाए।तुम

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समस्या सेक्स नहीं, खालीपन है

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समस्या सेक्स नहीं, खालीपन है सेक्स समस्या नहीं है।समस्या है—भीतर का खालीपन। जब तुम नहीं जानतेकि तुम कौन हो,तब इच्छातुम्हें खींचती है,घसीटती है,शासित करती है। सेक्ससरल है,जैविक है।पर आसक्ति—जटिल है,मानसिक है। तुम भूखे हो,पर यह भूखदेह की नहीं।तुम्हें लगता हैसेक्स तृप्त करेगा—पर वह वादा करता है,पूरा नहीं करता। हम बिना आत्म-बोध के जीते हैं।और उसी

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अपने आप को दूसरा जन्म दो

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“अपने आप को दूसरा जन्म दो” पहला जन्ममाँ की कोख से होता है—शरीर मिलता है,नाम मिलता है,पर मैं कौन हूँयह नहीं मिलता। बच्चा रोता है,भूख लगती है,डर लगता है—यह प्रकृति सिखाती है। पर बड़ा होकर भीअगर आदमीसिर्फ़भूख, डर और लालच मेंही जीता रहे—तो जन्म अधूरा है। एक उदाहरण देखो—एक बच्चाखिलौना छिनते हीमारने दौड़ पड़ता है।अगर

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जब सफलता स्वयं को असफल कर दे

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“जब सफलता स्वयं को असफल कर दे” हम कहते हैं—मैं आगे बढ़ रहा हूँ।तनख़्वाह बढ़ी,पहचान बढ़ी,अनुभव जुड़ते गए। पर किसी ने नहीं पूछा—किसके लिए? जिसके लिएदिन-रात दौड़े,वही भीतरऔर थक गया। पैसा जमा हुआजैसे अलमारी में कपड़े,पर मननंगा ही रहा। डिग्रियाँ आईं,सम्मान मिला,पर नींदऔर हल्की हो गई। अगर यह विकास है,तो फिरघबराहट क्यों बढ़ी? हम जो

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पहले घाव बेचते हैं, फिर मरहम

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“पहले घाव बेचते हैं, फिर मरहम” वे तुम्हें बताते हैं—तुम अधूरे हो।आईने में नहीं,विज्ञापन में दिखाते हैंतुम्हारा चेहरा। कहते हैं—तुम जैसे हो,वैसे काफ़ी नहीं। यहीं सेसौदा शुरू होता है। पहलेमन मेंकमी बोई जाती है—तुम सफल नहीं,तुम सुंदर नहीं,तुम योग्य नहीं। फिर मुस्कराकरमरहम बढ़ाया जाता है—हमारे लिए काम करो,हमारी परिभाषा कासपना देखो,हमारी चीज़ें ख़रीदो—तभीतुम पूरे होओगे।

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ज़िंदगी ही आईना

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ज़िंदगी ही आईना हम भागते रहते हैं,इतनी तेज़ी सेकि अपनी ही परछाईंपीछे छूट जाती है। शोर में जीते हुएहमने चुप्पी सेआँख मिलाना छोड़ दिया।क्योंकि चुप्पीसवाल पूछती है। रुको—और देखो,तुम असल में कर क्या रहे हो?किस डर ने तुम्हेंइतना व्यस्त बना रखा है? क्यों अकेलेपन कीहल्की-सी आहटतुम्हें बेचैन कर देती है?क्यों भविष्यउम्मीद और डर के बीचझूलता

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अपनी ही जेब से चोरी

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अपनी ही जेब से चोरी हम चोरी तब पहचानते हैंजब उँगलियाँकिसी और की जेब में जाती हैं। पर जबमैं अपने ही सपनों कोचुपचाप गिरवी रख देता हूँ,जबमैं अपनी ऊँचाई सेखुद ही मुँह मोड़ लेता हूँ—तब कोई शोर नहीं होता। मैं खुद से झूठ बोलता हूँ,फिर उसी झूठ कोसच की तरहओढ़ लेता हूँ। दूसरों को धोखाकुछ

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झूठे कर्तव्यों का बोझ

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झूठे कर्तव्यों का बोझ अगर कर्तव्यकंधों पर पत्थर बन जाए,तो समझ लो—वह कभी तुम्हारा था ही नहीं।सच्चा उत्तरदायित्वझुकाता नहीं,ऊँचा उठाता है। अधिकतर लोगजिसे “ज़िम्मेदारी” कहते हैं,वह दरअसलउधार लिया हुआ आदेश है।पूछो उनसे—तुम्हें कैसे पताकि यही तुम्हारा कर्तव्य है?उत्तर मेंबस एक खाली निगाह मिलेगी। “मुझे सफल होना ही चाहिए—यह मेरी ज़िम्मेदारी है।”“मुझे शानदार करियर बनाना है।”“मुझे

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रेड लाइट एरिया

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रेड लाइट एरिया(अतुकांत कविता) यहाँ रातदिन से पहले जाग जाती है,और उजालेशर्म से सिर झुका लेते हैं। लाल बत्तियाँसिर्फ संकेत नहीं,यहाँ रुकी हुई ज़िंदगियों कीधड़कन हैं। हर दरवाज़े के पीछेकोई कहानी है—किसी की मजबूरी,किसी का छल,किसी का अधूरा बचपन। यहाँ हँसीसीखकर ओढ़ी जाती है,और आँसूमेकअप में छिपा दिए जाते हैं। कोई माँ हैजो रोज़ अपने

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लक्ष्मण रेखा के उस पार

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लक्ष्मण रेखा के उस पार(अतुकांत कविता) एक समय था—गलत कामअँधेरे में होते थे,पर अँधेरा हीशर्म का सबूत था। छिपनाइस बात की गवाही देता थाकि कहीं न कहींअभी नैतिकता ज़िंदा है,अभी आत्मापूरी तरह मरी नहीं है। तब समाजगलत को गलत कहने कासाहस तो रखता था,और अपराधीनज़र झुकाकर चलता था। अब—गलत कामखुले मंच पर हैं,तालियों के बीच,कैमरों

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