समाज और यथार्थ

स्क्रिप्ट के बाहर घटता प्रेम

प्रेम और रिश्ते, समाज और यथार्थ, हिंदी कविता

स्क्रिप्ट के बाहर घटता प्रेम प्रेमस्वाभाविक नहीं है।स्वाभाविक हैजंगल—सीमा खींचना,कब्ज़ा करना,हार्मोन का शोर। यहीजंगल-प्रेम है—जो सहज आता है,औरआसानी सेहिंसक हो जाता है। सच्चा प्रेमवहाँ शुरू होता हैजहाँजंगल पार किया जाए,जहाँसमाज की सिखाई हुईपरिभाषाएँभुला दी जाएँ। जितना स्पष्टतुमअपनी कंडीशनिंग देखते हो,उतना ही कमदूसरों सेचौंकते हो। हमव्यक्ति नहीं हैं,हमस्क्रिप्ट हैं—प्रशिक्षित,प्रोग्राम किए हुए,पूर्वानुमेय। परक्योंकिहम अपनी हीस्क्रिप्ट नहीं देखते,इसलिएजीवनहमें

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उधार की रोशनी के पार

समाज और यथार्थ

उधार की रोशनी के पार(Beyond Borrowed Light)(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, विचारोत्तेजक अतुकांत कविता) सबसे गहरी जिज्ञासाकठोर प्रश्न से शुरू होती है—औरविनम्र मौन मेंसमाप्त होती है। हम जाँचते नहीं,मान लेते हैं।किसी पुराने धर्माचार्य ने कहा—तो सच होगा।किसी अमीर,किसी सत्ता-शिखर,किसी प्रसिद्ध चेहरे ने बोला—तो सही ही होगा। घर की परंपरा है,समाज की रीति है—इसलिएहम झुक जाते हैं। पर क्याहम

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(स्वीकृति के गुलाम, सत्य से अनजान)

समाज और यथार्थ

Slaves of Approval, Strangers to Truth(स्वीकृति के गुलाम, सत्य से अनजान)(दृष्टान्त सहित, लम्बी विचारप्रद अतुकांत कविता) सच यह है—तुम किसी और के गुलाम नहीं हो।तुमअपने डर के गुलाम हो,अपनी लालसा के गुलाम हो।और कोई मालिक नहीं। तुम्हारे जीवन केसबसे निजी कोने तकएक ही सवालदम घोंटता रहता है—“वे क्या सोचेंगे?” तुम बोलते होक्योंकि लोग देख रहे

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मन का अबीर

मन का अबीर: समकालीन विद्रूप पर एक हिंदी कविता

समाज और यथार्थ

इस कविता में: ‘मन का अबीर’ शीर्षक के अंतर्गत आधुनिक समाज के खोखलेपन और दिखावे पर कटाक्ष करती यह हिंदी कविता मानवीय संवेदनाओं के असली रंगों की तलाश करती है। भूमिका होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि अंतर्मन के उन धूसर कोनों को रंगने का अवसर है, जहाँ नैतिकता और संवेदनाएं जमी हुई हैं।

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मार्च 2026 फाल्गुन चैत्र माह वसंत और होली पर आधारित प्रेरक कविता

रंगों की क्रांति: जागती चेतना की हिंदी कविता

समाज और यथार्थ

इस कविता में रंगों की क्रांति हिंदी कविता में समाज की चेतना, परिवर्तन की पुकार और मनुष्य की जागती आत्मा का ओजपूर्ण चित्रण किया गया है। भूमिका कभी-कभी इतिहास केवल शब्दों से नहीं बदलता,वह बदलता है रंगों से —क्रोध के लाल से, शांति के सफेद से, आशा के हरे से, और संघर्ष के केसरिया से।

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माँ से मंगल तक: नारी की अनंत उड़ान

आधी दुनिया की आवाज़: हिंदी कविता का ओजपूर्ण घोष

समाज और यथार्थ

इस कविता में इस कविता में आधी दुनिया की आवाज़ को नारी चेतना, समान अधिकार, आत्मसम्मान और समकालीन सामाजिक संघर्षों के रूप में स्वर दिया गया है। यह हिंदी कविता समाज को आईना दिखाती है। भूमिका आधी दुनिया की आवाज़ सदियों से दबाई गई, पर वह कभी मिटी नहीं। वह घर की चौखट से संसद

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💖 प्रेम और करुणा / मनीभाई नवरत्न

प्रेम और रिश्ते, समाज और यथार्थ, हिंदी कविता

प्रेम और करुणा पर प्रेरक हिंदी लेख। जानिए कैसे सच्चा प्रेम करुणा में बदलकर जीवन को सकारात्मक और अर्थपूर्ण बनाता है।

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चूल्हे से चौपाल तक / समर्पित सरोजिनी नायडू की जयंती – 13 फरवरी

समाज और यथार्थ

चूल्हे से चौपाल तक राष्ट्रीय महिला दिवस (भारत) पर अतुकांत कविता (समर्पित सरोजिनी नायडू की जयंती – 13 फरवरी) 4 चूल्हे की आँच मेंसदियों से तपती रही एक देहपर उस देह मेंएक स्वप्न भी था—जो धुएँ से ऊपर उठना चाहता था। वह सिर्फ रोटी नहीं सेंकती थी,वह समय को गूँथती थी,आटे में मिलाती थीसंघर्ष की

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पत्ता, पेट और पृथ्वी

पत्ता, पेट और पृथ्वी / मनीभाई नवरत्न

समाज और यथार्थ

पत्ता, पेट और पृथ्वी हम खड़े हैं एक ऐसे समय मेंजहाँ सवालरोटी बनाम रोज़गार का नहीं,रोटी बनाम भविष्य का है।तेंदूपत्ता अब केवल पत्ता नहीं रहा—वह नीति है, मजबूरी है,हमारी सामूहिक चुप्पी काहरा दस्तावेज़ है। मनुष्य कहता है—मेरे बच्चे हैं,मेरी भूख है,विकल्प नहीं मेरे पास ।जबकिविकल्प हमेशा होता है,बस हम टालते रहते हैं उसे।जो जलती है

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jeb aur jism

“जेब और जिस्म की शादी”

समाज और यथार्थ

“जेब और जिस्म की शादी” शादी—एक ऐसा शब्दजिसके भीतर प्रेम से ज़्यादाभ्रम रहता है।हम सोचते हैंहम किसी व्यक्ति को चुन रहे हैं—पर सच मेंहम उसके भीतर नहीं देखते,सिर्फ़ उसकी सतह को नापते हैं। लड़की की दृष्टिलड़के की जेब में उतरती है—वह भविष्य नहीं ढूँढती,भविष्य की गारंटी ढूँढती है।जैसे मनुष्य नहीं,एक बीमा पॉलिसी चुन रही होजिस

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कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ

समाज और यथार्थ

यह कविता आधुनिक समाज की सोच, जीवन-शैली और दिखावटी प्रगति पर तीखा, व्यंग्यात्मक और विचारोत्तेजक प्रहार है। कवि आज के व्यक्ति को आईना दिखाता है, जो तकनीक, ट्रेंड और तथाकथित सफलता में उलझकर जीवन के मूल अर्थ से दूर होता जा रहा है।

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लाओ–सू : मार्ग का महागुरु -मनीभाई नवरत्न

समाज और यथार्थ

लाओ–सू : मार्ग का महागुरु प्राचीन चीन के धूसर बादलोंऔर शांत पर्वतों के बीचएक आत्मा जन्मी—जिसे संसार ने पुकारा—लाओ–सू,अर्थात् “आदरणीय वृद्ध गुरु”। इतिहास धुँधला है,समय की धूल पन्नों पर जमी है—कुछ कहते—वह मिथक था,कुछ कहते—कई महान आत्माओं काएक संयुक्त स्वरूप।पर सत्य यह है—ज्ञान जब जन्म लेता है,तो व्यक्ति नहीं, विचार बनकर जीता है। कहते हैं—वह

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