समाज और यथार्थ

स्त्री एक दीप-डॉ. पुष्पा सिंह’प्रेरणा’

समाज और यथार्थ

स्त्री एक दीप स्त्री बदलती रहीससुराल के लिएसमाज के लिएनए परिवेश मेंरीति-रिवाजों मेंढलती रही……स्त्री बदलती रही! सास-श्वसुर के लिए,देवर-ननद के लिए,नाते-रिश्तेदारों के लिएपति की आदतों को न बदल सकीखुद को बदलती रही! इतनी बदल गयी किखुद को भूल गयी!फिरभी किन्तु परंतुचलता ही रहा,समझाइश भी मिलती-दूसरों को नहीं खुद को बदल लो! शायद थोड़ी सी बच

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स्वच्छता पर कुंडलिया

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स्वच्छता पर कुंडलिया घर घर में अब देश के, मने स्वच्छता पर्व।दूर करें सब गंदगी, खुद पर तब हो गर्व।खुद पर तब हो गर्व, न कोई कोना छोड़ें।बदलें आदत सर्व, समय का अब रुख मोड़ें।नद नालें हो साफ, बहे जल उनमें निर्झर।नया स्वच्छता भाव, पले भारत के हर घर।।1 साफ-सफाई के लिये, चलें नये अभियान।सर्व

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प्लास्टिक मिटा देंगे हम

समाज और यथार्थ

प्लास्टिक मिटा देंगे हम दुनिया से प्लास्टिक मिटा देंगे हम. हम तुम सनम चलो खाले कसम |दुनिया से प्लास्टिक मिटा देंगे हम | ये गलता नही मिट्टी मे मिलता नही |खाती गाये पेट उनके पचता नहीं | मरती गायों को मिल बचाएंगे हम |हम तुम सनम चलो खाले कसम | इसके बर्तन बोतल इस्तेमाल न करो

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स्वरोजगार तुमको ढूंढना हैं/डीजेन्द्र कुर्रे “कोहिनूर”

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“डीजेन्द्र कुर्रे की कविता ‘स्वरोजगार तुमको ढूंढना है’ में स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा दी गई है। यह कविता युवाओं को स्वरोजगार के महत्व को समझाते हुए उन्हें प्रेरित करती है कि वे अपने सपनों को पूरा करने के लिए खुद को ढूंढें और अपने पैरों पर खड़े हों।” सारांश: “स्वरोजगार तुमको ढूंढना है” एक

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jivan doha

जीवन के दोहों का संकलन

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जीवन के दोहों का संकलन 1- है मलीन चादर चढ़ी, अंतः चेतन अंग। समझे तब कैसे भला, हूँ मैं कौन मलंग।। 2- प्रतिसंवेदक कॄष्ण हैं, लिया पार्थ संज्ञान। साध्य विषय समझे तभी, हुआ विजय अभियान।। 3- मैं अनुनादी उम्र भर, अविचारी थे काज। जिस दिन प्रज्ञा लौ जली, समझे तब यह राज।। (मैं – अहंकार)

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dr bhimrao ambedkar

भीमराव अम्बेडकर पर दोहे

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भीमराव रामजी आम्बेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956), डॉ॰ बाबासाहब आम्बेडकर नाम से लोकप्रिय, भारतीय बहुज्ञ, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और समाजसुधारक थे।[1] उन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और अछूतों (दलितों) से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया था। श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन भी किया था। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि एवं न्याय मन्त्री, भारतीय संविधान के जनक एवं भारत गणराज्य के निर्माताओं में से एक थे। भीमराव अम्बेडकर पर दोहे

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शिक्षक दिवस पर कविता

समाज और यथार्थ

शिक्षक दिवस पर कविता शिक्षक से है ज्ञान प्रकाश ।शिक्षक  से बंधती है आस।शिक्षक में करुणा का वास।जिनके कृपा से चमके अपना ताज।चलो मनाएं , शिक्षक दिवस आज। शिक्षक दिलाते हैं पहचान ।शिक्षक से ही बनते  महान ।शिक्षक होते गुणों की खान।निभायेंगे हम ये सम्मान का रिवाज।चलो मनाएं , शिक्षक दिवस आज। जग में सुंदर, 

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9 नवम्बर राष्ट्रीय क़ानूनी साक्षरता दिवस पर कविता

समाज और यथार्थ,

9 नवम्बर राष्ट्रीय क़ानूनी साक्षरता दिवस अन्याय जब हद से बढ़ जाए ,बेईमानी सर पे चढ़ जाए ।समाज में निज मान पाने कोजो अपने हक पे लड़ जाए ।आज है जिसकी आवश्यकता ,वो है, वो है कानूनी साक्षरता ।।न्याय सभी के लिए, चाहे अज्ञानी निर्धन ।बिन इसके कैसे ? हो सुरक्षित जनजीवन ।सही न्याय मिले,शीघ्र

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वीरांगना बिलासा बाई वीरगाथा पर दोहे

समाज और यथार्थ

(वीरांगना बिलासा बाई निषाद की वीर गाथा,जिसके नाम से छ.ग. के सुप्रसिद्ध शहर-बिलासपुर का नाम पड़ा)(जनश्रुति के अनुसार) वीरांगना बिलासा बाई वीरगाथा पर दोहे बहुत समय की बात है,वही रतनपुर राज।जहाँ बसे नर नारि वो,करते सुन्दर काज।।1।।केंवट लगरा गाँव के,कुशल परिश्रमदार।कर आखेटन मत्स्य का,पालत स्व परिवार।।2।।तट देखन अरपा नदी,इक दिन पत्नी साथ।पत्नी बैसाखा कही,लिए हाथ

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summer sea

भोजपुरी पर्यावरण लोक गीत -जून दुपहरिया में

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जून दुपहरिया में जून दुपहरिया मे देहिया जरेला |सूखल होठवा पियासिया लगेला | सुना मोरे सइया |कईसे बीतिहे गरमिया के दिनवा हमार |सुना मोरे सइया | पेड़वा का छांव नाही ,चले केवनों उपाय नाही |टप-टप चुवेला पसीनवा चैन कही आय नाही |सुना मोरे सइया |ले आई देता एसी कूलर घरवा हमार |सुना मोरे सइया | गउआ

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शादी से पहले

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शादी से पहले मैं जीना चाहता थाएकांत जीवन प्रकृति के सानिध्य में।पर न जाने कब उलझासेवा सत्कार आतिथ्य में ।अनचाहे  विरासत में मिलीदुनियादारी की बागडोर ।धीरे-धीरे जकड़ रही हैमुझे बिना किए शोर।कभी तौला नहीं थाअपना वजूद समाज के पलड़ों में ।अब जरूरी जान पड़ताकि पड़ूँ दुनियादारी के लफड़ों में ।सुख चैन मिलता सहजशादी से पहले

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चैत्र नवरात्र पर घनाक्षरी

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नवदुर्गा सनातन धर्म में माता दुर्गा अथवा माता पार्वती के नौ रूपों को एक साथ कहा जाता है। इन नवों दुर्गा को पापों की विनाशिनी कहा जाता है, हर देवी के अलग अलग वाहन हैं, अस्त्र शस्त्र हैं परन्तु यह सब एक हैं। माता के नव् रूपों पर कविता बहार की कुछ रचनाये – चैत्र

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