(स्वीकृति के गुलाम, सत्य से अनजान)

Slaves of Approval, Strangers to Truth
(स्वीकृति के गुलाम, सत्य से अनजान)
(दृष्टान्त सहित, लम्बी विचारप्रद अतुकांत कविता)

सच यह है—
तुम किसी और के गुलाम नहीं हो।
तुम
अपने डर के गुलाम हो,
अपनी लालसा के गुलाम हो।
और कोई मालिक नहीं।

तुम्हारे जीवन के
सबसे निजी कोने तक
एक ही सवाल
दम घोंटता रहता है—
“वे क्या सोचेंगे?”

तुम बोलते हो
क्योंकि लोग देख रहे हैं।
तुम चुप रहते हो
क्योंकि लोग देख रहे हैं।

उनकी नज़र
तुम्हारी सलाख़ बन जाती है।
और तुम
उसे ही
अपना घर मान लेते हो।

क्यों?

क्योंकि
तुमने मान लिया है
कि तुम वही हो
जो दूसरे कहते हैं।

कोई कह दे—
“तुम बहुत अच्छे हो,”
और तुम
फूल जाते हो।

इसलिए नहीं
कि तुमने
अपना सत्य देखा,
बल्कि इसलिए
कि तुम भूखे हो—
और प्रशंसा का
एक टुकड़ा भी
भोज लगने लगता है।

पर उसी पल
ज़हर भी उतर जाता है—
तुमने
अपना केंद्र
किसी और के हाथ
सौंप दिया।

सुबह
वही होंठ
तुम्हें आकाश पर बिठाएँ,
और शाम
वही होंठ
तुम्हें मिट्टी में मिला दें।

यदि
प्रशंसा ने उठाया,
तो
अपमान कुचल देगा।

इसी का नाम
गुलामी है।

और यह
केवल इसलिए होती है
क्योंकि
तुम नहीं जानते
कि तुम कौन हो।

जहाँ
स्पष्टता होती है,
वहाँ
रायें
अप्रासंगिक हो जाती हैं।

पर
स्पष्टता के बिना
तुम
भीख माँगते हो—
शालीनता से,
लगातार—
मान्यता की,
प्रमाणपत्र की,
इस संकेत की
कि तुम पर्याप्त हो।

अपने सबसे करीबी रिश्तों में भी
तुम
मुखौटा पहनकर रहते हो।

स्वयं के
संस्करण प्रस्तुत करते हो—
पसंद किए जाने के लिए,
स्वीकारे जाने के लिए।

और सबसे दुखद क्या है?
तुम इसे
प्रेम कहते हो।

यह प्रेम नहीं,
यह
डर का वेश है।
यह
कायरता है
जो अंतरंगता का
नाटक कर रही है।

दृष्टान्त

क्या तुमने
कभी
एक असली शिशु को
देखा है?

दो महीने का बच्चा—
यदि रोना है,
तो रोता है।

उसे
सभ्यता नहीं चाहिए।
उसे
स्वीकृति नहीं चाहिए।

तुम
दुनिया के राष्ट्रपति हो—
यदि तुम्हारा चेहरा
उसे नहीं भाता,
तो वह
तुम्हें थप्पड़ मार देगी।

और यदि
तुम फिर भी
मँडराते रहे—
तो
तुम्हारा कीमती सूट
बिना अपराध-बोध
गंदा कर देगी।

वह
डरती नहीं।
झिझकती नहीं।
अभिनय नहीं करती।

वह
सच है।

और
कभी
वह तुम थे।

फिर
क्या हुआ?

तुमने
हिचकिचाहट उठा ली।
तुमने
शर्म उठा ली।
तुमने
मुखौटे उठा लिए।

जब तुम
सबसे अधिक
कमज़ोर थे,
और
अपनापन चाहते थे—
तब
तुम्हें सिखाया गया
कि
सत्य के बदले
स्वीकृति ले लो।

हाँ,
समाज ने
तुम्हारे भीतर के बच्चे का
उपयोग किया।

हाँ,
तुम्हें
अनजाने में
कंडीशन किया गया।

नुकसान
हो चुका।

पर अब
सवाल यह नहीं है
कि अतीत में क्या हुआ।

सवाल यह है—
क्या यह
जारी रहना चाहिए?

पिंजरे का
दरवाज़ा
खुला है।

अब
तुम्हें तय करना है—

क्या तुम
बाहर कदम रखोगे?

या
अब भी
परछाइयों के आगे
घुटने टेकते रहोगे—
और उन्हें
अपना मालिक
कहते रहोगे?

स्वीकृति के गुलाम बने रहना आसान है।
सत्य में खड़ा होना—
यही
स्वतंत्रता है।
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