कविता बहार

आत्मा-अवलोकन


हम डरते रहे आत्मा-अवलोकन से,
इस भ्रम में कि
जैसे ही सच मान लिया,
कोई हाथ में पोछा थमा देगा
और कहेगा —
“अब साफ करो,
यह तुम्हारी ही गंदगी है।”


हम थक चुके थे
दोष ढोते-ढोते,
इसलिए सच से भी
काम की तरह डरते थे।
फिर एक वाक्य आया—
कठोर नहीं,
पर निर्विवाद:
“जैसे ही बंधन स्वीकारे जाते हैं,
आप वही नहीं रहते।”
कोई समाधान नहीं दिया गया,
कोई विधि नहीं,
कोई सुधार कार्यक्रम नहीं—
सिर्फ़ देखा गया।
और वही देखना
खेल का अंत था।


पुराना ‘मैं’
जो बहस करता था
शॉवर के नीचे,
जो हर रात
अधूरी लड़ाइयाँ लड़ता था,
जो बेचैनी को
अपना स्वभाव समझ बैठा था—
वह चुपचाप
मंच से उतर गया।
दुनिया वैसी ही रही,
लोग भी वही,
स्थितियाँ भी वही—
पर
ढोने वाला
गायब हो गया।
तब समझ आया—
जागरूकता
कोई बोझ नहीं बढ़ाती,
वह उस मज़दूर को हटा देती है
जो बिना पूछे
सारा जीवन
बोझ उठाता रहा।
और जब उठाने वाला ही नहीं,
तो वजन किसका?


पर्यवेक्षक बचता नहीं,
यह सच है—
पर खोता भी नहीं।
वह मुक्त होता है
उस व्यक्ति से
जो स्वयं को
समस्या समझ बैठा था।

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