सरसी छंद विधान / बीत बसंत होलिका आई/ बाबू लाल शर्मा

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सरसी छंद का विधान निम्नलिखित है:

  • प्रत्येक पंक्ति में १६ मात्राएँ होती हैं।
  • पदांत में २१ गाल होते हैं, जिसमें चौपाई और दोहा शामिल हो सकते हैं।
  • प्रत्येक चरण में दो पंक्तियाँ होती हैं।
  • प्रत्येक चरण में एक पंक्ति में ११ मात्राएँ होती हैं।

उदाहरण के रूप में:

सरसी छंद विधान / बीत बसंत होलिका आई/ बाबू लाल शर्मा

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बीत बसंत होलिका आई,
अब तो आजा मीत।
फाग रमेंगें रंग बिखरते,
मिल गा लेंगे गीत।

खेत फसल सब हुए सुनहरी,
कोयल गाये फाग।
भँवरे तितली मन भटकाएँ,
हम तुम छेड़ें राग।

घर आजा अब प्रिय परदेशी,
मैं करती फरियाद।
लिख कर भेज रही मैं पाती,
रैन दिवस की याद।

याद मचलती पछुआ चलती,
नही सुहाए धूप।
बैरिन कोयल कुहुक दिलाती,
याद तेरे मन रूप।

साजन लौट प्रिये घर आजा,
तन मन चाहे मेल।
जलता बदन होलिका जैसे,
चाह रंग रस खेल।

मदन फाग संग बहुत सताए,
तन अमराई बौर।
चंचल चपल गात मन भरमें,
सुन कोयल का शोर।

निंदिया रानी रूठ रही है,
रैन दिवस के बैर।
रंग बहाने से हुलियारे,
खूब चिढ़ाते गैर।

लौट पिया जल्दी घर आना,
तुमको मेरी आन।
देर करोगे, समझो सजना,
नहीं बचें मम प्रान।
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बाबू लाल शर्मा , बौहरा, विज्ञ

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