मनीभाई के दोहे ( Manibhai ke Dohe)

मनीभाई के दोहे

(1)

जंगल मंदिर बन गये , शहर हुए अब खेत।
मानव के करतूत से , हो गये पशु निश्चेत।।

(2)

मानव तेरी भूख ही , मांस नोच के खाय।
है तू हिंसक पशु बड़ा, देखत सब थर्राय।

(3)

मानव रक्षक है प्रकृति ,मानव बन शैतान ।
छोटे से सुख के लिए,काटत मुर्गा श्वान।।

(4)

प्रीत मानवी तोड़ता , मानव से ही आस ।
कभी सँजोया सृष्टि को, खेलत कभी विनाश।


(5)

चुगली औषधि होत है, मरहम जैसा काम।
परनिंदा से हो सुखी , निज निंदा श्री धाम।

मनीभाई नवरत्न
मनीभाई नवरत्न

📝 कवि परिचय

यह काव्य रचना छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना ब्लाक क्षेत्र के मनीभाई नवरत्न द्वारा रचित है। अभी आप कई ब्लॉग पर लेखन कर रहे हैं। आप कविता बहार के संस्थापक और संचालक भी है । अभी आप कविता बहार पब्लिकेशन में संपादन और पृष्ठीय साजसज्जा का दायित्व भी निभा रहे हैं । हाइकु मञ्जूषा, हाइकु की सुगंध ,छत्तीसगढ़ सम्पूर्ण दर्शन , चारू चिन्मय चोका आदि पुस्तकों में रचना प्रकाशित हो चुकी हैं।

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