प्रकृति और पर्यावरण

प्रकृति की सुंदरता, ऋतुओं के परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और सृष्टि के विविध रूपों को दर्शाने वाली कविताएँ इस वर्ग में संकलित हैं।

प्रकृति की पुकार (अतुकान्त कविता)

प्रकृति और पर्यावरण, हिंदी कविता

“प्रकृति की पुकार” एक भावपूर्ण अतुकान्त हिंदी कविता है, जो मानव और प्रकृति के बिगड़ते संबंध, पर्यावरण संकट और चेतना की आवश्यकता को सशक्त शब्दों में प्रस्तुत करती है।

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सूखती झीलें, रोता पर्यावरण

प्रकृति और पर्यावरण

सूखती झीलें, रोता पर्यावरण पर आधारित यह अतुकान्त कविता जल संकट, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन की चेतावनी देती है। पढ़ें और जागरूक बनें।

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जल, जीवन और भविष्य

प्रकृति और पर्यावरण

विश्व आर्द्रभूमि दिवस (World Wetlands Day) पर अतुकान्त कविता 📝 अतुकान्त कविता जलसिर्फ बहता नहीं,वह स्मृतियों को भी साथ लेकर चलता है। धरती की धड़कनों मेंआर्द्रभूमि की नमी है—जहाँ मिट्टी, जल और आकाशएक-दूसरे का हाथ थामे खड़े हैं। यहीं जन्म लेती है हरियाली,यहीं उतरते हैं प्रवासी पंछीथके पंखों को विश्राम देने। आर्द्रभूमि—न कोई शोर,न कोई

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चार्ल्स डार्विन : प्रकृति का अन्वेषक – मनीभाई नवरत्न

प्रकृति और पर्यावरण, हिंदी कविता

चार्ल्स डार्विन : प्रकृति का अन्वेषक बारह फ़रवरी की सुबहएक बालक जन्मा इंग्लैंड में—शांत, सरल, परआँखों में छिपा थाअनवरत खोज का प्रकाश। उसके मन में प्रश्न थे—पेड़ क्यों बढ़ते हैं?पक्षी क्यों बदलते हैं?कछुओं के खोल अलग क्यों?फूलों के रंग भिन्न क्यों?और जीवन इतना विविधफिर भी एक जैसा क्यों? डार्विन—जिसने इन प्रश्नों कोवैज्ञानिक साहस में बदला।

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उपभोग का पहाड़ – मनीभाई नवरत्न

प्रकृति और पर्यावरण

🛍️ उपभोग का पहाड़ 🛍️ वे बाज़ार जाते हैंबस एक कपड़ा लेने,पर लौटते हैं —थैले से लदे,मन से खाली। आवश्यकता दरवाज़े पर रह जाती है,लालच भीतर कुर्सी पर बैठ जाता है।“सेल चल रही है”,“एक खरीदो एक मुफ़्त पाओ” —ये जादू के शब्द हैं,जो मनुष्य को वस्तु बना देते हैं। दुकानों में अब वस्त्र नहीं,स्वप्न टंगे

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भूख का शास्त्र- मनीभाई नवरत्न

प्रकृति और पर्यावरण

“भूख का शास्त्र” भूखा आदमीविचार नहीं करता,वह रोटी की आकृति में ईश्वर देखता है।जो टुकड़ा फेंक दे —वही उसका भगवान बन जाता है। भूख, आदर्शों की अंतिम परीक्षा है,जहाँ नीति किताबों में रह जाती हैऔर पेट—धर्मग्रंथ बन जाता है। चापलूसी कोई गुण नहीं,पर भूख उसे भी सिखा देती है“जी हजूर” के मीठे उच्चारण,“सत्य” से कहीं

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संक्रांति पर कविता/ रेखराम साहू

प्रकृति और पर्यावरण

संक्रांति हिंदू पंचांग के अनुसार सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करने को कहा जाता है। वर्ष में कुल 12 संक्रांतियाँ होती हैं, लेकिन सबसे प्रमुख मकर संक्रांति मानी जाती है, क्योंकि इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। संक्रांति पर कविता                   मोह-मकर से मुक्ति-पथ,में गतिमयता,क्रांति।शपथ

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जुल्मी अगहन पर कविता / शकुन शेंडे
बचेली

प्रकृति और पर्यावरण

    जुल्मीअगहन जुलुम ढाये री सखी, अलबेला अगहन!शीत लहर की कर के सवारी, इतराये चौदहों भुवन!! धुंध की ओढ़नी ओढ़ के धरती, कुसुमन सेज सजाती।ओस बूंद नहा किरणें उषा की, दिवस मिलन सकुचाती।विश्मय सखी शरमाये रवि- वर, बहियां गहे न धरा दुल्हन!!जुलूम….. सूझे न मारग क्षितिज व्योम- पथ,लथपथ पड़े कुहासा।प्रकृति के लब कांपे-न बूझे,वाणी की

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बचेली
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जंगल पर कविता: प्रकृति का जादू और अद्भुत अनुभव (2024)

प्रकृति और पर्यावरण, हिंदी कविता

जंगल पर कविता के माध्यम से प्रकृति का महत्व, पर्यावरण संरक्षण, और वन्यजीवन का समर्थन सीखें। इस लेख में जानें कि कैसे जंगल पर कविताएँ हमें पर्यावरण से जोड़ती हैं।

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Haathi par kavita : 5 बेहतरीन हाथी पर कविताएँ

प्रकृति और पर्यावरण

“हाथी पर कविता” पढ़ें और जानें इस अद्भुत प्राणी की महानता को। हाथी की कविताओं से प्रेरणा और ज्ञान पाएं। हाथी, हमारे ग्रह का एक अनोखा और शक्तिशाली प्राणी है जो अपनी विशालता, समझदारी, और सामाजिकता के लिए प्रसिद्ध है। चाहे जंगल का राजा हो या किसी धार्मिक स्थल का प्रतीक, हाथी हमेशा से मानव

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प्रकृति पर दोहे/रेखराम साहू

प्रकृति और पर्यावरण, हिंदी कविता

प्रकृति पर दोहे/रेखराम साहू प्रकृतिजन्य जीवन सभी,रहे नित्य यह ज्ञान।घातक जो इनके लिए, त्याज्य सभी विज्ञान।। प्रकृति बिना जीवन नहीं,प्रकृति प्राण आधार।जीवन और प्रकृति बिना,धन-पद सब निस्सार।। जीवन पोषक हों सभी, धर्म-कर्म के कोष।धर्म-कर्म परखे बिना, दुर्लभ है संतोष।। देश-काल संदर्भ में, हितकारी व्यवहार।मानक धर्मों का यही,करे विश्व स्वीकार।। हर युग के इतिहास में, निहित

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hasdeo river

हसदेव बचाव अभियान पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण

हसदेव बचाव अभियान पर कविता हसदेव को बचाना है पेड़ काटोगे तो हवा घटेगी,जल हो जायेगा गुम,मानव तेरे पतन का,चहूंँ ओर होगा धूम ही धूम। कहीं लुप्त हो जाएगा,यह प्रकृति का सुंदर चित्र,मनुष्य मारे पैर में कुल्हाड़ी,यह कार्य है विचित्र।वक्त की यही है आवाज,विश्व को भी बताना है,जग के अस्तित्व के लिए,हसदेव को बचाना है।

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