प्रकृति और पर्यावरण

प्रकृति की सुंदरता, ऋतुओं के परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और सृष्टि के विविध रूपों को दर्शाने वाली कविताएँ इस वर्ग में संकलित हैं।

doha sangrah

मनीभाई के दोहे ( Manibhai ke Dohe)

प्रकृति और पर्यावरण

मनीभाई के दोहे (1) जंगल मंदिर बन गये , शहर हुए अब खेत।मानव के करतूत से , हो गये पशु निश्चेत।। (2) मानव तेरी भूख ही , मांस नोच के खाय।है तू हिंसक पशु बड़ा, देखत सब थर्राय। (3) मानव रक्षक है प्रकृति ,मानव बन शैतान ।छोटे से सुख के लिए,काटत मुर्गा श्वान।। (4) प्रीत […]

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yog

योग भगाये रोग / कंचन कृतिका

प्रकृति और पर्यावरण,

कंचन कृतिका की कविता “योग भगाये रोग” योग के शारीरिक और मानसिक लाभों को उजागर करती है। इस कविता में योग के महत्व और उसके द्वारा रोगों के निवारण का वर्णन किया गया है। कवि ने योग को एक चमत्कारी उपाय के रूप में प्रस्तुत किया है, जो न केवल शारीरिक बीमारियों से छुटकारा दिलाता

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तांका काव्य विधा पर रचनायें

प्रकृति और पर्यावरण

तांका एक प्राचीन जापानी काव्य विधा है जो संक्षिप्त और संरचित रूप में गहन भावनाओं और विचारों को व्यक्त करती है। यह विधा पाँच पंक्तियों में लिखी जाती है, और प्रत्येक पंक्ति में निर्धारित मात्रा होती है। तांका का शाब्दिक अर्थ “लघु गीत” या “छोटा गीत” होता है। इसे “वाका” के रूप में भी जाना

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chandani raat

आँख खुलने लगी / नीलम

प्रकृति और पर्यावरण

आँख खुलने लगी/ नीलम आँख खुलने लगी/ नीलम रात के पिछले पहर मेंशीत की ठंडी लहर मेंकोहरे की चादर ओढ़ेसो रहे थे चाँद-तारे धीरे -धीरे धरा सरकतीजा पहुँची प्राची के द्वारेथरथराती ठंड से सिकुड़तीथपथपा खुलवा रही थी द्वार उषा ने धीमें से झांका झिरी सेफिर हौले से खोले द्वारपहचान पृथा को थोड़ा साकिया स्वागत उजास

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save nature

पर्यावरण हमारा /आचार्य मायाराम ‘पतंग’

प्रकृति और पर्यावरण

पर्यावरण हमारा /आचार्य मायाराम ‘पतंग’ हमको जीवन देता है यह पर्यावरण हमारा । इसे नष्ट करने से होगा जीवन नष्ट हमारा ॥ अज्ञानी हम ज्ञान राशि, औरों को बाँट रहे हैं। उसी डाल पर बैठ उसे ही, जड़ से काट रहे हैं। माँ प्रकृति ने हमको पाला, अपना दूध पिलाकर । हम उसको ही पीड़ित

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acid-rain

कारवाँ पर कविता / रमेश कुमार सोनी

प्रकृति और पर्यावरण

कारवाँ पर कविता / रमेश कुमार सोनी धरती माँ से सुनीकल एक कहानीदूध की नदियाँ औरसोने की चिड़िया थी कभीआँचल रत्नगर्भा औरपानी की अमृतधारा थी यहींवृक्षों की ठंडी छाँह औरखट्टे-मीठे फल का स्वादपरोसती थी वो कभी । आज मुझे वो मिली है-जहरीली हवाओं की दम घोंटू साँस औरअम्लीय वर्षा की चिंता लिएसीना छलनी हुएबोरवेल से

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tree

वृक्ष लगाएं धरती बचाएं/ नीलम त्यागी ‘नील’

प्रकृति और पर्यावरण

“वृक्ष लगाएं, धरती बचाएं” एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि हमें पर्यावरण की संरक्षण के लिए वृक्षारोपण का समर्थन करना चाहिए। वृक्ष लगाना हमारे पर्यावरण के सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि वृक्ष प्राकृतिक रूप से हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, वायु में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, और पर्यावरण के साथ हमारे

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पर्यावरण को नुकसान पर कविता

पर्यावरण को नुकसान पर कविता /एस के कपूर श्री हंस

प्रकृति और पर्यावरण

पर्यावरण को नुकसान पर कविता /एस के कपूर श्री हंस 1 नदी ताल में कम हो  रहा जल  हम पानी यूँ ही बहा रहे हैं। ग्लेशियर पिघल रहेऔर समुन्द्र तल यूँ बढ़ते ही जा रहे हैं।। काट    सारे वन कंक्रीट के कई जंगल बसा दिये विकास ने। अनायस विनाश की ओर कदम दुनिया के

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जलती धरती/डॉ0 रामबली मिश्र

जलती धरती/डॉ0 रामबली मिश्र

प्रकृति और पर्यावरण

जलती धरती /डॉ0 रामबली मिश्र सूर्य उगलता है अंगारा।जलता सारा जग नित न्यारा।।तपिश बहुत बढ़ गयी आज है।प्रकृति दुखी अतिशय नराज है।। मानव हुआ आज अन्यायी।नहीं रहा अब वह है न्यायी।।जंगल का हत्यारा मानव।शोषणकारी अब है दानव।। नदियों के प्रवाह को रोका।पर्वत की गरिमा को टोका।।विकृत किया प्रकृति की रचना।नित असंतुलित अधिसंरचना।। ओजोन परत फटा

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Hindi Poem Collection on Kavita Bahar

जलती धरती /रितु झा वत्स

प्रकृति और पर्यावरण

“जलती धरती” नामक कविता, जिसे रितु झा वत्स द्वारा रचा गया है, एक व्यक्तिगत अनुभव को अभिव्यक्ति देती है। इस कविता में, रचनाकार ने जलती धरती के माध्यम से मानव जीवन के अनेक पहलुओं को व्यक्त किया है। धरती की गर्मी, उसकी आत्मा को दहला देती है, जो हमें अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक करती

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पर्यावरण की रक्षा

जलती धरती/ आशा बैजल

प्रकृति और पर्यावरण

आशा बैजल की जलती धरती नामक हिंदी कविता में विभिन्न भावनाओं और संवेदनाओं को समाहित है। “जलती धरती” एक कविता है जो धरती की संताप और विपदाओं को बयान करती है। “जलती धरती” में, कविताकार धरती के विभिन्न प्राकृतिक विपदाओं की चर्चा करते हैं, जैसे कि वन जलन, भूकंप, बाढ़, और वायु प्रदूषण। यह कविता

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JALATI DHARATI

जलती धरती /हरि प्रकाश गुप्ता सरल

प्रकृति और पर्यावरण

जलती धरती /हरि प्रकाश गुप्ता सरल धरती जलती है तो जलने दीजिए।पेड़ कटते हैं तो कटने दीजिए।।भले ही जल जाए सभी कुछ यहांपर पर्यावरण की न चिंता कीजिए।कुछ तो रहम करो भविष्य के बारे में अपने लिए न सही आगे की सोचिए।।न रहेंगे जंगल और न रहेगी शीतलताहरियाली धरा में न दिख पाएगी।न कुछ फिर

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