नंदा जाही का संगी -सुशील कुमार राजहंस

नंदा जाही का संगी -सुशील कुमार राजहंस

कविता संग्रह
कविता संग्रह



हां संगवारी धीरे धीरे सब नंदात हे।
मनखे मशीन के चक्कर म फंदात हे।
किसानी के जम्मो काम अब इहि ले हो जात हे।
कोनो कमात हे कोनो मशीन ले काम चलात हे।
देखतो नवां नवां जमाना म का का आत हे।
हमर पुरखा के कतको चिन्हारी ह लुकात हे।


अब कहां पाबे घर म बैला नांगर।
ताकत के बुता करोईया देशी जांगर।
किसान के दौंरी धान मिसे के बेलन।
चिकला म फंसे रहेय तेन ल धकेलन।
लुका गे भईया बईला भैंसा के गाड़ी।
चातर होगे तीरे तीर के जंगल झाड़ी।


कहां हे पानी के पलोइया टेढ़ा फांसा।
चुवां के पाटी अउ भीतरी के नंगत गांसा।
डेंकी म कुटन संगवारी हमर चाऊर अउ धान।
ये छूट गे घर, कुरिया,परछी ले अब कहां पान।
उरीद, मूंग, तिंवरा के पिसोईया जांता।
घर ले तोड़ दिस हे दिनों दिन के नाता।


चिट्ठी पतरी के लिखोईया कोन मेर ले लाबे।
संदेशा भेजे बर परेवा सुआ तैं कहां ले पाबे।
अब तो बस एक्के घा तोर नंबर घूमाबे।
दूरिहा रहोईया ल मोबईल म गोठियाबे।
नाचा गम्मत ल छोड़ मनखे टी बी ले मोहागे।
फूलझरी के डिस्को डांस म रेडियो ले अघागे।


कहां पाबे भौंरा, बांटी,फुगड़ी जईसने जूना खेल।
डोकरा डोकरी के धोती लुगरा म तईहा कस मेल।
एईरसा,पूरी जईसने कतको तिहार के रोटी।
ठेठरी अउ पानपुरवा ल खोजवं कोन कोति।
संगी ई सब के दुःख ल कोन ल सुनावं।
सुआरथ के दुनियां म कोन ल बुलावं।


गुनत रहिथों कहूं मैं ह झिन फंस जावं।
ये मया के जूना गांव फेर कोन मेरा ले लावं।


रचयिता – सुशील कुमार राजहंस

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