कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

रूह की बस्ती में बसा लिया

हिंदी कविता

रूह की बस्ती में बसा लिया     हम तुझे  छोड़  भी नहीं पाये, अलविदा  कहकरदिल में तुम ही तुम हो, ख्वाबों-ख़यालों में रहकरइब्तिसाम  तेरी  क़यामत, रह गयी  इन आँखों  मेंभूलना   तो   चाहा   बहुत,   बेवफा   है   कहकरहम तुझे छोड़ भी नहीं पाये… ये शाम  और  ये शहर,  भाता  नहीं  अब  मुझकोजिन्दा हूँ  यादों के सहारे, 

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मिलते हैं हमसफर

समाज और यथार्थ

मिलते हैं हमसफर कैसा भी सफर होसाथ से कट जातासुविधा से  व्यक्तिमंजिल तक पहुँचता । अब सफर स्कूल तकसफर खेल मैदान कापनघट तक का होया फिर मंदिर मस्जिदया उत्सव त्यौहार कासब हम सफर रहतेसुख दुख साझा सहते। जीवन के सफर में भीएक हम सफर चाहिएसुहाना हो जाये सफरसमय हो जाये सुखकर। नियम बनाये गये हैंसमाज

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आज मैं बोलूंगा

मन और भावनाएँ

आज मैं बोलूंगा आज मैं बोलूंगा…खुलकर रखूंगा अपने विचार…अभिव्यक्ति की आजादी जो हैं…सीधे सपााट, सटीक शब्द रखूंगा…आम जनता के मन मस्तिष्क में ..समाने वाले..मस्तिष्क की गहराईयोंं तक…उतर जायेंगे…मौन शब्द…करेंगे …प्रहार पर प्रहार… छलनी करेेंगे…अन्तर्आत्मा…नहीं कहूूंंगा अनर्गल…कहना भी नहीं चाहिए क्योंकि…अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब…किसी पर कुछ भी… जबरन लादना तो नहीं है…नहीं भूलूंगा अपनी सीमाएं….करूंगा

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बंद का समीकरण -रमेश कुमार सोनी

समाज और यथार्थ

बंद का समीकरण-रमेश कुमार सोनी बंद है दुकानें, कारोबारभारत बंद का हल्ला हैलौट रहे हैं मज़दूर, कामगारअपने डेरों की ओर खाली टिफिन,झोला लिए हुए,बंद हैं रास्ते, अस्पतालशहर का सूनापन चुभ रहा है मुझेभूख का भेड़ियाबियाबान खामोशी फैलाकरलौट गया है अपने राजाप्रासाद में ।।अकेले भाग रहे हैं जरूरतमंद लोगउग्र भीड़ के प्रकट होने से डरे हुएशहर

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संगीत जरुरी है  

प्रकृति और पर्यावरण

संगीत जरुरी है   जीवन  एक  मधुर   संगीत  है  ।इसे  सुर  लय  में  गाना  सीखो ।सात  सुरो  की स्वर मालिका  को,शुद्ध   कंठों  से  लगाना  सीखो ।। परमेश्वर   का    वरदान  है ,  संगीत  ।सुर  -लय  छंद   का  गान  है,  संगीत ।संगीत   नहीं  तो ,  जीवन   नीरस  है ।गुणी  जन  की  पहचान   है,  संगीत ।। सप्त  सुरों  की 

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तुम फूल नहीं बन सकती

समाज और यथार्थ

तुम फूल नहीं बन सकती कलतुम गुल थी,गुलाब थी,एक हसीन ख्व़ाब थी।हर कोईदेखना चाहता था तुम्हें !हर कोई….छूना चाहता था तुम्हें !!कल तकपुरुष ने तुम्हेंकेवल कुचोंऔर नितम्बों केआकार में देखा..तुमकेवल वस्तु मात्र थी,उसकेउत्तुंग-विलास मेंछलछलातीमधु-पात्र थी ।तुम शाश्वत थीकिंतुउस समाज मेंतुम्हारा कोई अपनावजुद नहीं था ।आजपुरुष केसमानांतर चलने का..हर पग पर,हर डग परउसके गढ़े हुएकसौटियों कोतोड़ने

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सुंदर सा मेरा गाँव

हिंदी कविता

सुंदर सा मेरा गाँव यही सुंदर सा मेरा गाँवपले हम पाकर सबका प्यार।यहाँ बनता नहीं धर्म तनावयहीं अपना सुखमय संसार।बजे जब यहाँ सुबह के चारकरें जब नृत्य विपिन में मोर। दिशा पूरब सिंदूर उभारनिशा की गोद तजे  जब भोर।कृषक उठकर बैलों को खोललिए अब चलें जहाँ गोआर।सुनो तब झंकृत घंटी बोलबँधे जो गले करें झंकार

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कौन हो तुम?-डॉ. पुष्पा सिंह’प्रेरणा

हिंदी कविता

कौन हो तुम? शब्दों के चित्र,कोरे कागज़ पर,स्याही उड़ेलकर,कलम को कूची बनाकर,कविता की सूरत,बला की खूबसूरत!कैनवास पर,भावों का समर्पण करउकेर देते हो!कौन हो तुम?कवि या कोई चित्रकार?छेनी-हथोड़े की तरह,औजार बनाकर,तराशी उंगलियों से,गढ़ते हो..पत्थर की मूरत,बला की खूबसूरत!फिर–फूंक देते हो प्राण,साँसों को अर्पण करकौन हो तुम?कवि या कोई शिल्पकार?कौन हो तुम……—-डॉ. पुष्पा सिंह’प्रेरणा’अम्बिकापुर(छ. ग.)

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सर्दी मौसम पर कविता

हिंदी कविता

सर्दी मौसम पर कविता वो जाड़े की रात, ओस की बरसात,वो दिन का कुहासा, पढ़ने की आशा,बासंती पवन, मस्त होता है मन,वो ताजी हवाएं ,ये महकी फिजायेंबहुत खूब भाता है सर्दी का मौसम ।। सर्द जाड़े की आग, मालकौस की राग,वो धान की कटनी , पुदीने की चटनी,वो सरसों का साग, ठंड रातों का आग,वो

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छत्तीसगढ़ी संस्कृति

नारी जीवन और संवेदना

छत्तीसगढ़ी संस्कृति दक्षिण कोशल के बीहड़ वन मेंसाल, सागौन की है भरमारसतपुड़ा पठार शोभित उत्तर मेंमध्य है महानदी बस्तर पठारदेखो छत्तीसगढ़ की छटा मनोहरचलो करें हम वन विहार ।।      है छत्तीसगढ़ का खेल ये अनुपम     फुगड़ी,लंगड़ी,अटकन-बटकन      कैलाश गुफा, बमलेश्वरी मंदिर का      देख नजारा खो जाता है मन     ऐसे भव्य प्रदेश में आकर     बाँटू  सभी

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मेरी पलकें नमाज़ी हुई

हिंदी कविता

मेरी पलकें नमाज़ी हुई मेरी  पलकें  नमाज़ी  हुई  तेरे  दीदार  सेनूर बरसता है यूँ पाक़  तेरे रुख़सार से ।मुजस्सिम ग़ज़ल हो मेरी, उम्र की ताजमहल काबेयक़ीन  हुआ  नहीं  मैं  इश्क़  में  ऐतबार  से ।गोया  कि  तुम  मेरे हाथ  की लकीर हो या रबहाथ  होता  नहीं  तो  क्या  होता जाँ निसार से ।मसरूफ़ियत  में  भी  हमने 

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