पिता धर्म निभना अति भारी-बाबू लाल शर्मा

पिता धर्म निभना अति भारी-बाबू लाल शर्मा

चौपाई मुक्तक
(१६ मात्रा मापनी रहित, सममात्रिक छंद)
. पिता
. °°
पिता ईश सम हैं दातारी।
कहते कभी नहीं लाचारी।
देना ही बस धर्म पिता का।
आसन ईश्वर सम व्यवहारी।१

तरु बरगद सम छाँया देता।
शीत घाम सब ही हर लेता!
बहा पसीना तन जर्जर कर।
जीता मरता सतत प्रणेता।२

संतति हित में जन्म गँवाता।
भले जमाने से लड़ जाता।
अम्बर सा समदर्शी रहकर।
भीषण ताप हवा में गाता।३

बन्धु सखा गुरुवर का नाता।
मीत भला सब पिता निभाता!
पीढ़ी दर पीढ़ी दुख सहकर!
बालक तभी पिता बन पाता।४

धर्म निभाना है कठिनाई।
पिता धर्म जैसे प्रभुताई।
नभ मे ध्रुव तारा ज्यों स्थिर।
घर हित पिता प्रतीत मिताई।५

जगते देख भोर का तारा।
पूर्व देख लो पिता हमारा।
सुत के हेतु पिता मर जाए।
दशरथ कथा पढ़े जग सारा।६

मुगल काल में देखो बाबर।
मरता स्वयं हुमायुँ बचा कर।
ऋषि दधीचि सा दानी होता।
यौवन जीवन देह गवाँ कर!७

पिता धर्म निभना अति भारी।
पाएँ दुख संतति हित गारी।
पिता पीत वर्णी हो जाता।
समझ पुत्र पर विपदा भारी।८
. °°°°
बाबू लाल शर्मा

इस रचना को शेयर करें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top