28 मई वीर सावरकर पुण्यतिथि पर कविता

वह पहला देशभक्त

राजेंद्र राजा

वह पहला देशभक्त जिसने सब वस्त्र विदेशी जलवाए।

स्वराज स्वदेशी मंत्र दिया सब उसके साथ चले आए।

वह पहला अमरपुत्र जिसने पूरी आजादी माँगी थी।

उसके कदमों की आहट से भारत की जनता जागी थी॥

वह पहला वीर पुरुष जिसने लंदन में बिगुल बजाया था ।

प्रवासी भारत वीरों का आजादी संघ बनाया था ।

वह पहला बैरिस्टर था जो डिग्री से वंचित किया गया।

रह गए देखते न्यायालय ना न्याय सत्य को दिया गया ॥

वह था पहला साहित्यकार प्रतिबंधित जिसकी रचनाएँ।

जिनको पढ़कर आजादी की जन-जन में जगी भावनाएँ ।।

था वह पहला इतिहासकार जिसने ना झूठा कथन सहा ।

अंग्रेज गदर कहते जिसको, स्वातंत्र्य प्रथम संग्राम कहा ।।

पहला दो देशों का बंदी इंग्लैंड-फ्रांस का वाद बना।

उस विश्व हेग न्यायालय में जाकर इक नया विवाद बना ॥

तीन रंग का पहला ध्वज लंदन में स्वयं बनाया था।

जिसको लेडी कामाजी ने जर्मन जाकर फहराया था ।

था पहला देशभक्त जिसको ‘दो जीवन कारावास’ मिला।

फिर भी वह सच्चा सेनानी आजादी पथ से नहीं हिला ॥

पहला बंदी कवि, जेलों की दीवारों पर लिख दी कविता ।

बिन कागज कलम और स्याही के, बहती रही काव्य सरिता ॥

पहला समतावादी चिंतक जिसने दलितों को अपनाया ।

फिर दलित वर्ग के मानव को मंदिर का सेवक बनवाया ॥

भारत माता का वह सपूत आया था युगद्रष्टा बनकर ।

या भारत की आजादी की सृष्टि का युगस्त्रष्टा बनकर ॥

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