कविता: प्रेम का मानवीय रूप (अतुकान्त)
प्रेम
गुलाब नहीं
जो सिर्फ़ एक दिन खिले,
प्रेम वह हाथ है
जो अँधेरे में भी
छूटता नहीं।
प्रेम
कहना नहीं,
समझ जाना है—
थकी आँखों की भाषा,
और चुप्पी का अर्थ।
प्रेम
बाज़ार की वस्तु नहीं,
जिस पर दाम लिखा हो,
यह तो
सम्मान की साँस है,
जो दोनों को जीवित रखती है।
प्रेम
देह से आगे की यात्रा है,
जहाँ इच्छा नहीं
ज़िम्मेदारी चलती है,
और अधिकार नहीं
सहयोग।
प्रेम
मानव को
और अधिक मानव बनाता है—
थोड़ा धैर्यवान,
थोड़ा करुणामय,
और बहुत सच्चा।
यही प्रेम है,
जो दिन नहीं देखता—
पर
14 फरवरी को
हमें
याद दिला देता है।
