शौचालय विशेष छतीसगढ़ी कविता

शौचालय विशेष छतीसगढ़ी कविता

सुधारू केहे-“कस रे मितान!
तोला सफई के,नईये कछु भान।
तोर आस-पास होवथे गंदगी
इही च हावे सब्बो बीमारी के खान।”

बुधारू कहे-“मय रेहेंव अनजान।
लेवो पकड़त हावों मोरो दूनों कान।
लेकम येकर सती, का करना चाही संगी ?
अहू बात के,  कर दो बखान।

सुधारू कहे-“हमर सरकार ल
महतारी मोटियारी के चिंता हावे।
शौचालय बना लेवो जम्मो
ये मे अब्बड़ सुभीता हावे ।


रात-बिकाल के संशो नी,बिछी-कुछी के डर।
सफ्फा रेहे हामर घर, अऊ सफ्फा रेहे डहर।
बीमारी होही अब्बड़ दूर ,खुसियाली छाही।
देस-बिदेस म हामर गाँ भी प्रसिद्धि पाही।”

सुधारू के कहे म बुधारू
एक चीज मन म पालय हे।
अऊ चीज हावे रे संगी
“जहाँ सोच हे वहाँ शौचालय हे।”

manibhainavratna
manibhai navratna

(रचयिता:- मनी भाई)

मनीभाई नवरत्न
मनीभाई नवरत्न

📝 कवि परिचय

यह काव्य रचना छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना ब्लाक क्षेत्र के मनीभाई नवरत्न द्वारा रचित है। अभी आप कई ब्लॉग पर लेखन कर रहे हैं। आप कविता बहार के संस्थापक और संचालक भी है । अभी आप कविता बहार पब्लिकेशन में संपादन और पृष्ठीय साजसज्जा का दायित्व भी निभा रहे हैं । हाइकु मञ्जूषा, हाइकु की सुगंध ,छत्तीसगढ़ सम्पूर्ण दर्शन , चारू चिन्मय चोका आदि पुस्तकों में रचना प्रकाशित हो चुकी हैं।

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