KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

अचरज मा परगे(acharach ma parge)

कोठी तो बढ़हर के* छलकत ले भरगे।
बइमानी के पेंड़ धरे पुरखा हा तरगे॥
अंतस हा रोथे संशो मा रात दिन।
गरीब के आँसू हा टप-टप ले* ढरगे॥
सुख के सपुना अउ आस ओखर मन के।
बिपत के आगी मा सब्बो* हा  जरगे॥
सुरता के रुखवा हा चढ़े अगास मा।
वाह रे वा किस्मत! पाना अस झरगे*
माछी नहीं गुड़ बिना हवे उही हाल।
देख के गरीबी ला मया मन टरगे॥
जिनगी अउ मन मा हे कुल्लुप अँधियार।
रग-बग अंजोर भले बाहिर बगरगे॥
वाह रे विकास सलाम हावय तोला।
धान, कोदो, तिवरा, मण्डी मा सरगे॥
नाली मा काबर भोजन फेंकाथे।
गरीबी मा कतको, लाँघन तो  मरगे॥ 
लोगन के कथनी अउ करनी ला देख।
*”निर्मोही”* बिचारा, अचरज मा परगे॥
     *बालक “निर्मोही”*✍
           बिलासपुर
        30/05/2019